चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १७ ] सूत्रस्थानम् २१७ और सर्पण होता है । पित्तजन्य विद्रधि में—प्यास, जलन, मूर्च्छा, मद और ज्वर होता है । कफजन्य विद्रधि में—जम्भाई, वमन, भोजन में अरुचि, शरीर की जड़ता और ठण्डक होती है । सब विद्रधियों में बहुत अधिक शूल उत्पन्न हो जाता है । गरम शस्त्रों से जिस प्रकार कोई मसल रहा हो, या गरम वस्तुओं से कोई जला रहा हो, ऐसा प्रतीत होता है । ॐ विद्रधि के पकने पर बिच्छुओं के काटने के समान दर्द होता है । अब स्राव के लक्षण कहते हैं—स्राव के लक्षण—जो स्राव पतला, रूक्ष, लाल और झागदार हो तो उसे वातज विद्रधि का स्राव, जो स्राव तिल, उड़द, कुलथी के पानी के समान हो तो पित्तज विद्रधि का और जो स्राव श्वेत, घना, चिकना और मात्रा में बहुत हो तो कफज विद्रधि का होता है । संनिपातजन्य विद्रधि में सब दोषों के लक्षण होते हैं ॥ ८६-६६ ॥ अथासां विद्रधीनां साध्यासाध्यत्व-विशेष-ज्ञानार्थं स्थानकृतं लिङ्ग- विशेषमुपदेक्ष्यामः—तत्र प्रधानमर्मजायां विद्रध्यां हृद्घट्टन-तमक-प्रमोह- कासाः, क्लोमजायां पिपासा-मुख-शोष-गल-ग्रहाः, यकृज्जायां श्वासः, प्लीहजायामुच्छ्वासोपरोधः, कुक्षिजायां कुक्षिपाश्र्वान्तरांसशूलं, वृक्क- जायां पार्श्व-पृष्ठ-कटि-ग्रहः, नाभियायां हिक्का, वङ्क्षणजायां सक्थिसदः, बस्तिजायां कृच्छ्र-पूति-मूत्र-वर्चस्त्वं चेति ॥ १०० ॥ पक्वप्रभिन्नास्तूर्ध्वजासु मुखात्स्रावः स्रवति, अधोजासु गुदात्, उभयतस्तु नाभिजासु ॥ १०१ ॥ तासां हृन्नाभिबस्तिजाः परिपक्वाः सान्निपातकी च मरणाय, अवशिष्टाः पुनः कुशलमाशुप्रतिकारिणं चिकित्सकमासाद्योपशाम्यन्ति; तस्मादचिरोत्थितां विद्रधि शस्त्र-सर्प-विद्युदग्नि-तुल्यां स्नेह-स्वेद-विरेच- नैराशुवेवोपक्रामेत् सर्वशो गुल्मवच्चेति ॥ १०२ ॥ अब इन विद्रधियों के साध्य-असाध्य जानने के लिये स्थानजन्य विशेष लक्षण बतलाते हैं । यथा—प्रधान मर्मस्थान ( हृदय ) में उत्पन्न विद्रधि में हृदय का संघट्टन, तमक ( आंखों के आगे अन्धेरा ) सांस, मूर्च्छा, कास होता है । क्कोमजन्य विद्रधि में प्यास, मुख का सूखना, गलेका रुकना, यकृत्-जन्य विद्रधि में-श्वास, और प्लीहाजन्य विद्रधि में श्वास की रुकावट और मूर्च्छा, कुक्षि में विद्रधि होने पर कुक्षि और पार्श्व के बीच में शूल और उसी पार्श्व के ॐ कई स्थानों पर कलिकाता की छपी पुस्तकों में निम्न पाठ है— "शस्त्रास्रैर्भिव्यत इव चोल्मुकैरिव दह्यते ॥"