भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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२४६ चरकसंहिता [ अ० २१ सब से प्रथम रोग की परीक्षा करनी चाहिये, उसके पीछे औषध की परीक्षा, इसके अनन्तर वैद्य ज्ञानपूर्वक चिकित्सा का आरम्भ करे। जो वैद्य, रोग की परीक्षा द्वारा निश्चय किये बिना चिकित्सा कर्म आरम्भ कर देता है, भले ही वह वैद्य औषधि के विधान को जानता हो, तो भी उसकी सफलता निश्चित नहीं ( कभी हो जाती है, और कभी नहीं)। जो वैद्य रोगों को भली प्रकार जानता है, इसी प्रकार औषधियों को भी जानता है, साथ में देश, काल और प्रमाण को भी समझता है, उसकी सफलता निश्चित, अवश्यम्भावी है ॥२०-२२॥ तत्र श्लोकाः—संग्रहः प्रकृतिर्देशो विकारमुखमीरणम् । असंदेहोऽनुबन्धश्च रोगाणां संप्रकाशितः ॥ २३ ॥ दोषस्थानानि रोगाणां गणा नानात्मजाश्च ये । रूपं पृथक्त्वादोषाणां कर्म चापरिणामि यत् ॥ २४ ॥ पृथक्त्वेन च दोषाणां निर्दिष्टाः समुपक्रमाः । सम्यङ् महति रोगाणामध्याये तत्त्वदर्शिना ॥ २५ ॥ रोगों की संक्षिप्त संख्या, इनके स्थान और इनके साक्षात् अथवा प्रेरक कारण, असन्देह, और अनुबन्ध, दोषों के स्थान, नानाप्रकार के रोगों की गणना, दोषों के पृथक् पृथक् रूप, और स्वाभाविक कर्म, दोषों के पृथक् पृथक् शान्ति के उपाय, इस महारोग अध्याय में तत्त्वदर्शि पुनर्वसु ने कह दिये हैं ॥२३-२४॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के महारोगाध्यायो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ एकविंशोऽध्यायः । अथातोऽष्टौनिन्दितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे 'अष्टौनिन्दितीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥ इह खलु शरीरमधिकृत्याष्टौ पुरुषा निन्दिता भवन्ति; तद्यथा— अतिदीर्घश्चातिह्रस्वश्चाविलोमा चालोमा चातिकृष्णश्चातिगौरश्चातिस्थू- लश्चातिकृशश्चेति ॥ ३ ॥ इस लोक में शरीर के सम्बन्ध में ( मन के सम्बन्ध में अधार्मिक आदि इन से भिन्न हैं ) आठ पुरुष निन्दित माने जाते हैं । यथा १. अतिदीर्घ २.