चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६६ चरकसंहिता [ अ० २३ जंघा, ऊरु और त्रिक ( कटि के नीचे ) प्रदेश में दर्द, पर्व, अस्थि और सन्धियों का टूटना, और अन्य वातजन्य रोग यथा ऊर्ध्ववात ( वायु का ऊपर चढ़ना ) आदि रोग अपतर्पण के कारण उत्पन्न होते हैं। अपतर्पण से उत्पन्न इन रोगों के लिये संतर्पण क्रिया औषध है। सन्तर्पण क्रिया दो प्रकार की है। यथा—सद्यः सन्तर्पण और अभ्यास ( क्रमशः शनैः शनैः ) सन्तर्पण। जो मनुष्य सहसा एकदम से क्षीण होता है, वह सद्यः सन्तर्पण क्रिया से पुष्ट होता है और देर से क्षीण हुआ पुरुष बिना अभ्यास जन्य सन्तर्पण के पुष्ट नहीं होता। जो पुरुष देर से निर्बल हो, उसमें शरीर जाठराग्नि, दोष, औषध बल, मात्रा और समय का विचार करके शान्ति से ( जल्दी न करके ) चिकित्सा करनी चाहिये। इस प्रकार के रोगी के लिये मांस, रस, दूध, घी, स्नान, बस्तियां, मर्दन, सन्तर्पण करने वाले मन्थ आदि प्रयोग करने चाहिये। ज्वर, कास के रोगियों के लिये, निर्बलों के लिये, मूत्रकृच्छ्र रोगियों के लिये, प्यास रोगवालों के लिये, ऊर्ध्ववात रोगियों के लिये, हितकारी तर्पण क्रिया का उपदेश करते हैं—शर्करा, पिप्पलीमूल, घी और शहद ये समान भाग लेकर इन सब से दुगुना सत्तू लेकर मन्थ बनाये। सत्तू, मदिरा, शहद और शर्करा इनसे मन्थ तैयार करके वायु, मल, मूत्र के अनुलोमन ( अधोमार्ग से बाहर करने के लिये ) और कफ, पित्त को अनुकूल करने के लिये प्रयोग करना चाहिये। फाणित ( राव ) सत्तू, घी, दधिमण्ड और धान्याम्ल कांजी, इनसे बना मन्थ मूत्रकृच्छ्र नाशक और उदावर्त्त रोग को नष्ट करने वाला तर्पण है। खजूर, मुनक्का, इमली, कोकम, अनारदाना, फालसा और आंवला उनसे बना हुआ मन्थ मदिरा के विकार को नष्ट करता है। खट्टे और मीठे (अनारदाना ) पदार्थों से पानी में बना और घी युक्त या बिना घी के बना हुआ मन्थ सद्यः सन्तर्पण है और स्थिरता, वर्ण कान्ति और बल को देता है ।। २६-३६ ॥ तत्र श्लोकः—संतर्पणोत्था ये रोगा रोगा ये चापतर्पणात् । संतर्पणीये तेऽध्यायं सौषधाः परिकीर्तिताः ॥ ४० ॥ सन्तर्पण और अपतर्पण से उत्पन्न जो जो रोग हैं उनको तथा उनकी औषध को इस सन्तर्पणीय अध्याय में कह दिया ॥ ४० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के सन्तर्पणीयो नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ॥ २३ ॥