चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ] सूत्रस्थानम् ११ गुण— सार्था गुर्वादयो बुद्धिः प्रयत्नान्ताः परादयः । गुणाः प्रोक्ताः, अर्थ ( इन्द्रिय और मन के ग्राह्य विषय ), गुरु आदि, बुद्धि, इच्छा से लेकर प्रयत्न तक और पर आदि अभ्यास पर्यन्त गुण हैं । इन्द्रियों के अर्थ—शब्द, स्पर्श, रूप,रस और गन्ध—मन के अर्थ चिन्तन, विचार, दुहना, ध्यान, संकल्प, गुरुत्व, लघुत्व, शीत, उष्ण, स्निग्ध रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु, कठिन, विशद, पिच्छिल, श्लक्ष्ण, खर, स्थूल, सूक्ष्म, सान्द्र, द्रव, ये बीस, तथा इच्छा, द्वेष, सुख दुःख और प्रयत्न, पर, अपर युक्ति, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परिणाम, संस्कार और अभ्यास ये गुण हैं । “रूपरसगन्धस्पर्शाः संख्यापरिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परपरत्वे बुद्धयः सुखदुखे इच्छा द्वेषौ प्रयत्नाश्च गुणाः ॥” वै० द० कर्म— प्रयत्नादि कर्म चेष्टितमुच्यते ॥ ४९ ॥ प्रयत्न जन्य चेष्टा शरीर का व्यापार कर्म कहाता है । उत्क्षेपणमपक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि ॥ वैशे० भ्रमणं रेचनं स्पन्दनोर्ध्वज्वलनमेव च । तिर्यग् गमनमप्यत्र गमनादेव लभ्यते ॥ प्रयत्नपूर्वक अर्थात् चेष्टापूर्वक क्रिया का नाम 'कर्म' है । “आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्यां हस्ते कर्म” ॥ वै० ॥ ४६ ॥ समवाय का लक्षण— समवायोऽपृथग्भावो भूम्यादीनां गुणैर्मतः । स नित्यो,यत्र हि द्रव्यं न तत्रानियतो गुणः ॥ ५० ॥ पृथिवी आदि द्रव्यों का ( आत्रेय भद्रकाप्यीय २६ वें अध्याय में कहे हुए ) काल का लक्षण—सूक्ष्मामपि कलां न लीयते, संकलयति वा भूतानि इति कालः । वैशे० दिशा का लक्षण—अस्मादिदं पूर्वेण अस्मादिदं पश्चिमेन इत्यादयः प्रत्यया यतो भवन्ति सा दिक् । इत इदमिति यतस्तद्दिशां लिङ्गम् । वैशे० जिससे यह व्यवहार किया जाय कि यह इससे पूर्व या पश्चिम में है, उसका नाम 'दिशा' है ।