चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचाहिये। रोगी के मन को मोहित ( मूर्च्छा उत्पन्न ) करने वाले कारणों से बचा कर रखना चाहिये ॥ ४५-५३ ॥ स्नेहस्वेदोपपन्नानां यथादोषं यथाबलम् । पञ्च कर्माणि कुर्वीत मूर्च्छायाेषु मदेषु च ॥ ५४ ॥ अष्टाविंशत्यौषधस्य तथा तिक्तस्य सर्पिषः । प्रयोगः शस्यते तद्वन्महतः षट्पलस्य वा ॥ ५५ ॥ त्रिफलायाः प्रयोगो वा सघृतक्षौद्रशर्करः । शिलाजतुप्रयोगो वा प्रयोगः पयसोऽपि वा ॥ ५६ ॥ पिप्पलीनां प्रयोगो वा प्रयोगश्चित्रकस्य वा । रसायनानां कौम्भस्य सर्पिषो वा प्रशस्यते ॥ ५७ ॥ रक्तावसेकाच्छास्त्राणां सतां सत्त्ववतामपि । सेवनान्मदमूर्च्छायाः प्रशाम्यन्ति शरीरिणाम्॥ ५८ ॥ इति ॥ मूर्च्छा और मद रोगों में बल एवं दोष के अनुसार स्वेदन देकर पीछे से वमन, विरेचन, शिरोविरेचन ( नस्य ), आस्थापन और अनुवासन रूपी पंचकर्म करने चाहिये । उन्माद चिकित्सा में कहे ‘पानीय कल्याण घृत’ ( अट्ठाईस दवाइयां ), महातिक्त घृत या महाषट्पल घृत ( कुष्ठ रोग में ) का पान करना उत्तम है। घी, शहद और शर्करा के साथ त्रिफला का प्रयोग करना, अथवा दूध के साथ शिलाजीत का प्रयोग करना, दूध के साथ पिप्पली चूर्ण या चीतामूल का प्रयोग करना, रसायनों तथा दस वर्ष पुराने मटके में रक्खे हुए घी का प्रयोग करना उत्तम है। रक्त मोक्षण, वेद आदि सत् शास्त्रों का पढ़ना, सज्जन, सत्वगुणी, तपस्वी पुरुषों का सत्संग मद मूर्च्छा रोग को शान्त करते हैं ॥ ५४-५८ ॥ तत्र श्लोकौ—विशुद्धं चाविशुद्धं च शोणितं तस्य हेतवः । रक्तप्रदोषजा रोगास्तेषु रोगेषु चौषधम् ॥ ५६ ॥ मद-मूर्च्छाय-संन्यास-हेतु-लक्षण-भेषजम् । विधिशोणितकेऽध्याये सर्वमेतत्प्रकाशितम् ॥ ६० ॥ शुद्ध या अशुद्ध रक्त, इनके कारण, रक्त प्रदोष से उत्पन्न होने वाले रोग, इनकी औषध, मद, मूर्च्छाय, संन्यास रोगों के कारण लक्षण और औषध, ये सब विषय इस ‘विधिशोणित’ अध्याय में कह दिये ॥ ५६-६० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के विधिशोणितीयो नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ॥ २४ ॥