चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७६ चरकसंहिता [ अ० २५ करता है और इसीसे आरोग्यता या रोग रूपी कर्मफलों का भोग करता है। क्योंकि 'चेतना धातु' आत्मा के बिना सुख दुःख के हेतु रूप आरोग्यता या व्याधि नहीं हो सकती ॥ ८-६ ॥ शरलोमा तु नेत्याह न ह्यात्माऽऽत्मानमात्मना । योजयेद् व्याधिभिर्दुःखैर्दुःखद्वेषी कदाचन ॥ १० ॥ रजस्तमोभ्यां तु मनः परीतं सत्त्वसंज्ञकम् । शरीरस्य समुत्पत्तौ विकाराणां च कारणम् ॥ ११ ॥ शरलोमा ऋषि बोले—यह ठीक नहीं। क्योंकि आत्मा स्वभाव से दुःखों से द्वेष रखने वाला 'आनन्दमय' है। इसलिये आत्मा अपने आपको व्याधियों के कष्टों से युक्त नहीं करेगा। वास्तव में, 'सत्त्व' नामक मन के साथ रज और तम गुण मिलकर पुरुष और रोग दोनों को ही उत्पन्न करते हैं ॥ १०-११ ॥ वार्योविदस्त्व नेत्याह नह्येकं कारणं मनः । नर्ते शरीरं शारीररोगा न मनसः स्थितः ॥ १२ ॥ रसजानि तु भूतानि व्याधयश्च पृथग्विधाः । आपो हि रसवत्यस्ताः स्मृता निर्वृत्तिहेतवः ॥ १३ ॥ वार्योविद ऋषि बोले—यह ठीक नहीं है कि अकेला मन ही इनकी उत्पत्ति में कारण है। क्योंकि शरीर के बिना न तो शारीरिक रोग हो सकते हैं और न मन ही रह सकता है। इसलिये प्राणियों की उत्पत्ति में कारण रस है और 'रस' से ही सब नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। रस की उत्पत्ति का जल ही इनकी उत्पत्ति का कारण है ॥ १२-१३ ॥ हिरण्याक्षस्तु नेत्याह न ह्यात्मा रसजः स्मृतः । नातीन्द्रियं मनः सन्ति रोगाः शब्दादिजास्तथा ॥ १४ ॥ षड्धातुजस्तु पुरुषो रोगाः षड्धातुजास्तथा । राशिः षड्धातुजो ह्येष सांख्यैराद्यैः प्रकीर्तितः ॥ १५ ॥ हिरण्याक्ष ऋषि बोले—कि नहीं, यह ठीक नहीं, आत्मा रसजन्य नहीं है, आत्मा और मन अतीन्द्रिय हैं। (कुछ रोग) भी शब्दादि (अतियोग अयोग, मिथ्यायोग) से उत्पन्न होते हैं। जो कि रसजन्य नहीं। वास्तव में पुरुष छः धातुओं (आत्मा और पृथ्वी अप, तेज, वायु एवं आकाश) से उत्पन्न होता है, रोग भी इन्हीं छः धातुओं से पैदा होते हैं। सांख्य दर्शन का सिद्धान्त भी है कि 'छः धातुओं के समूह का नाम पुरुष' है ॥ १४-१५ ॥