भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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२६६ चरकसंहिता [ अ० २६

र्व्वन्ति तत्कर्म, येन कुर्व्वन्ति तद्वीर्यं, यत्र कुर्व्वन्ति तदधिकरणं, यदा कुर्व्वन्ति स कालः, यथा कुर्व्वन्ति स उपायः, यत्साधयन्ति तत्फलम् ॥११। इस उपरोक्त उपदेश द्वारा जगत् में जो भी द्रव्य मिलते हैं, वे सब उपाय, प्रयोजन के उद्देश्य से औषध समझने चाहियें अर्थात् वे सब द्रव्य दोष- नाशक हैं, निरुपयोगी नहीं हैं। पार्थिवादि द्रव्य केवल गुरु खर आदि गुणों से औषध या दोष नष्ट करने वाले नहीं बन जाते, परन्तु द्रव्य द्रव्य के प्रभाव से, गुण के प्रभाव से, द्रव्य एवं गुण दोनों के प्रभाव से, उस उस समय में, उस अधिष्ठान का आश्रय लेकर, और उस योजना तथा प्रयोजन को लक्ष्य में करके जो करते हैं, उसका नाम 'कर्म' है, यथा-द्रव्य के प्रभाव से दन्ती ( जमाल गोटा ) विरेचक है, मणि आदि का धारण विष को दूर करता है । गुण के प्रभाव से—ज्वर में तिक्त रस, शीत में अग्नि । द्रव्य एवं गुण के प्रभाव से जैसे—कृष्णाजिन ( काली मृगछाला ) । यहां पर मृगछाला द्रव्य और कृष्ण गुण है। उसपर वे जो कार्य करते हैं। यथा—शिरोविरेचन द्रव्य शिर का विरेचन करते हैं, यह कर्म है। जिस के द्वारा ( उष्ण गुण के द्वारा शिरो विरेचन ) करते हैं वह 'वीर्य' अर्थात् 'शक्ति' है। जहां कर्म करते हैं, वह 'अधिकरण' है जैसे शिर । जिस समय करते हैं वह 'काल' है। जिस प्रकार करते है वह उपाय है । इस प्रकार से जो सिद्ध करते हैं वह फल है ॥११॥ भेदश्चैषां त्रिषष्टिविधविकल्पो द्रव्यदेशकालप्रभावाद् भवति, तमु- पदेक्ष्यामः ॥ १२ ॥ रसों के भेद इन छः रसों के द्रव्य प्रभाव से, देश प्रभाव से ( यथा-- हिमालय की द्राक्षा और दाडिम मीठे होते हैं दूसरे स्थानों के खट्टे ), काल प्रभाव से ( यथा-कच्चा आम और कसैला, कुछ बड़ा होने पर भी कच्चा आम खट्टा और पकने पर मीठा, इसी प्रकार हेमन्त में ओषधियां मीठी और वर्षा में खट्टी ), ( ६३ ) भेद बन जाते हैं ॥१२॥ यथा— स्वादुरम्लादिभिर्योगे शेषैरम्लादयः पृथक् । यान्ति पञ्चदशैतानि द्रव्याणि द्विरसानि तु ॥ १३ ॥ दो रस वाले पन्द्रह भेद हैं यथा—स्वादु ( मधुर ) और अम्ल के योग से पांच, अम्ल और लवण के योग से चार, लवण और कटु के योग से तीन, कटु, तिक्त और कषाय के योग से दो, तथा तिक्त और कषाय के योग से एक। जैसे— (१) मधुराम्ल ( २ ) मधुरलवण (३) मधुरकटु (४) मधुरतिक्त (५) मधुरकषाय ( ६ ) अम्ललवण ( ७ ) अम्लकटु ( ८ ) अम्लतिक्त ( ६ ) अम्लुकषाय (१०)