भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

३०० चरकसंहिता [ अ० २६ 'रस' है । यथा—पिप्पली आर्द्रावस्था में मधुर, और शुष्क अवस्था में 'कटु' रस है । इसलिये कटु व्यक्त रस, और मधुर अव्यक्त अनुरस है । अथवा पीछे से जो रस अनुभव होता है, वह 'अनुरस' है । यथा—कांजी, तक्र आदि पदार्थों के पीने पर प्रथम जिस रस का अनुभव हो वह रस और जो पीछे स्पष्ट हो वह 'अनुरस' है । सातवां रस कोई पृथक् नहीं है ॥ २६ ॥ परापरत्वे युक्तिश्च संख्या संयोग एव च । विभागश्च पृथक्त्वं च परिमाणमथापि च ॥ २७ ॥ संस्कारोऽभ्यास इत्येते गुणा ज्ञेयाः परादयः । सिद्धयुपायाश्चिकित्सायां लक्षणैस्तान् प्रचक्ष्महे ॥२८॥ दस गुण—पर, अपर, युक्ति, संख्या, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परिणाम, संस्कार और अभ्यास ये दस गुण हैं । चिकित्सा में सफलता इन दस गुणों में आश्रित है । इनके लक्षण कहते हैं ॥ २७-२८ ॥ देश-काल-वयो-मान-पाक-वीर्य-रसादिषु । परापरत्वे, युक्तिस्तु योजना या च युज्यते ॥ २६ ॥ संख्या स्याद् गणितं, योगः सहसंयोग उच्यते । द्रव्याणां द्वन्द्वसर्वैककर्मजोऽनित्य एव च ॥ ३० ॥ विभागस्तु विभक्तिः स्याद्वियोगो भागशो ग्रहः । पृथक्त्वं स्यादसंयोगो वैलक्षण्यमनेकता ॥ ३१ ॥ परिमाणं पुनर्मानं, संस्कारः करणं मतम् । भावाभ्यसनमभ्यासः शीलनं सततक्रिया ॥ ३२ ॥ इति स्वलक्षणैरुक्ता गुणाः सर्वे परादयः । चिकित्सा यैरविदितैर्न यथावत् प्रवर्तते ॥ ३३ ॥ गुणा गुणाश्रया नोक्तास्तस्माद्रसगुणान भिषक् । विद्याद् द्रव्यगुणान् कर्तुरभिप्रायाः पृथग्विधाः ॥ ३४ ॥ अतश्च प्रकृतं बुद्ध्वा देशकालान्तराणि च । तत्र कर्तुरभिप्रायानुपायांश्चार्थमादिशेत् ॥ ३५ ॥ देश-मरुदेश पर और आनूप अपर । काल-विसर्ग पर, आदान अपर । वय-तरुण पर, बाल, वृद्ध अपर । मान-शरीर का कहा हुआ पर, इस के अन्य अपर । पाक, वीर्य और रस ये जिस योग के प्रति हों उसके लिये पर दूसरों के प्रति अपर पर-अपर यह देश, काल, वय, मान, वीर्य, रस आदि के अपेक्षा से हैं। जैसे मरुदेश-बंगाल की अपेक्षा पर है, और बंगाल-मरुदेशों वालो की अपेक्षा मे पर