चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 328, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें३१० चरकसंहिता [ अ० २६ अवृष्य होता है। कषाय रस स्तम्भनकारक और शीतवीर्य होता है, परन्तु हरड़ का कषाय रस रेचक और उष्ण-वीर्य है। इस लिये रस को ही देखकर 'सब द्रव्य के गुण नहीं समझने चाहिये। रस की समानता होने पर भी द्रव्य-द्रव्य में गुणभेद देखा जाता है ॥ ४५-४९ ॥ रौक्ष्यात्कषायो रूक्षाणामुत्तमो मध्यमः कटुः । तिक्तोऽवरस्तथोष्णानामुष्णत्वाल्लवणः परः ॥ ५० ॥ मध्योऽम्लः कटुकश्चान्त्यः स्निग्धानां मधुरः परः । मध्योऽम्लो लवणश्चान्त्यो रसः स्नेहाग्निरुच्यते ॥ ५१॥ मध्योत्कृष्टवराः शैत्यात्कषाय-स्वादु-तिक्तकाः । [ तिक्तात्कषायो मधुरः शीताच्छीततरः परः । ] स्वादुरु॑रुत्वादधिकः कषायाल्लवणोऽवरः ॥ ५२ ॥ अम्लात्कटुस्ततस्तिक्तो लघुत्वादुत्तमो मतः । केचिल्लघूनामवरमिच्छन्ति लवणं रसम् ॥ ५३ ॥ गौरवे लाघवे चैव सोऽवरस्तूभयोरपि । इन छः रसों में कषाय, कटु, तिक्त तीनों रस रूक्ष हैं। इनमें भी कषाय रस रूक्षतम ( उत्तम ), कटु रसरूक्षतर ( मध्यम ) और तिक्त रस रूक्ष (अवर) है। इसी प्रकार लवण रस उष्णतम ( उत्तम ), अम्ल उष्णतर ( मध्यम ), कटु रस उष्ण ( अवर ) है। मधुर रस स्निग्धतम ( उत्तम ), अम्ल रस स्निग्धतर ( मध्यम ), लवण रस स्निग्ध ( अवर ) है। शैत्य धर्म सम्बन्ध की दृष्टि में कषाय रस मध्यम; स्वादु रस उत्कृष्ट और तिक्त रस अवर है। गुरुता की दृष्टि से मधुर रस सबसे गुरु, कषाय रस मध्यम और लवण रस सब से अवर है। लघु गुण की दृष्टि से अम्ल रस उत्तम, कटु मध्यम और तिक्त रस अवर है। कुछ आचार्य लवण रस को सब से लघु ( अवर ) मानते हैं। क्योकि अम्ल में पृथिवी कारण है, लवण में जल कारण है। इसलिये पृथिवीजन्य रस की अपेक्षा जलजन्य वस्तु हल्की होनी चाहिये, इसलिये भूतों के आधार से गौरव या लाघव का ज्ञान नहीं करना चाहिये। क्योंकि पानी की अधिकता से उत्पन्न रस, पृथ्वी की अधिकता से उत्पन्न कषाय रस से 'गुरु' होता है। यहां पर गुरुत्व की । से लघु माना है। वास्तव में इस मतभेद का कोई विशेष अर्थ नहीं, क्योकि ही पक्ष (लवण रस ) को अवर मानते हैं। अम्ल, कटु, तिक्त रस हूँ जो लवण रस को गुरु समझते हैं; वे गुरुता की दृष्टि से देखते हैं ।