चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१४ चरकसंहिता [ अ० २६ समान हों, तो वहां पर रस को विपाक, रस और विपाक को वीर्य, रस, विपाक, वीर्य को प्रभाव अपने स्वाभाविक बल से जीत लेता है। जिस प्रकार कि भैंस की चर्बी रस और विपाक में मधुर है, परन्तु वीर्य-उष्ण है, इसलिये वह मधुर रस के कार्य पित्त-शमन को न करके, उष्ण वीर्य के कार्य पित्तप्रकोप को करता है। मद्य, इसका रस और विपाक अम्ल है, वीर्य उष्ण है, परन्तु यही मद्य अपने प्रभाव से इन तीनों को रद्द करके स्त्रियों में दुग्ध उत्पन्न करता है। अब तक विपाक, वीर्य और प्रभाव का वर्णन भली प्रकार कर दिया है ॥ ६४-६६ ॥ षण्णां रसानां विज्ञानमुपदेक्ष्याम्यतः परम् ॥ ७० ॥ स्नेहन-प्रीणनाह्लाद-मार्दवै रुपलभ्यते । मुखस्थो मधुरश्चाऽऽस्यं व्याप्रुवंल्लिम्पतीव च ॥ ७१ ॥ दन्तहर्षान्मुखस्रावात्स्वेदनान्मुखबोधनात् । विदाहाच्चाऽऽस्यकण्ठस्य प्राश्यैवाम्लं रसं वदेत् ॥ ७२ ॥ प्रलीयन्क्लेदविष्यन्दमार्दवं कुरुते मुखे । यः शीघ्रं लवणो ज्ञेयः स विदाहान्मुखस्य च ॥ ७३ ॥ संवेजयेद्यो रसनां निपाते तुदतीव च । विदहन्मुखनासाक्षि संस्रावी स कटुः स्मृतः ॥ ७४ ॥ प्रतिहन्ति निपाते यो रसनं स्वदते न च । स तिक्तो मुख-वैशद्य-शोष-प्रह्लाद-कारकः ॥ ७५ ॥ वैशद्य-स्तम्भ-जाड्यैर्यो रसनं योजयेद्रसः । बध्नातीव च यः कण्ठं कषायः स विकास्यपि ॥ ७६ ॥ इति ॥ इसके आगे छः रसों के लक्षण कहते हैं। जो रस स्निग्धता, प्रसन्नता, आल्हाद अथवा मृदुता उत्पन्न करता है, मुख में रखने से सम्पूर्ण मुख को चिकास से भर देता है, लिसलिसा बना देता है, वह मधुर रस है। जो रस दांतों को खट्टा कर देता है, मुख से थूक ( लाला ) चुआता है, पसीना लाता है, मुख में जागृति उत्पन्न कर देता है, मुख और गले में जलन करता है, वह 'अम्ल' रस है। जो रस मुख में रखने से घुलने लगे, क्लिन्न नमीदार, लाला बहावे, मुख में हल्कापन लाये, मुख में विदाह करता हो, उसे 'लवण' रस कहते हैं। जो रस जीभ को छूते ही चुरचुराहट उत्पन्न करे और सुई जैसा चुभने लगे, मुख को जलाता हुआ नाक और आँखों से पानी बहाने लगे वह 'कटु' रस है। जो रस जीभ के साथ स्पर्श होने पर जीभ को जड़ कर दे और और कुछ अच्छा नहीं लगता और मुख को साफ करता है, सन्तोष की