भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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३३२ चरकसंहिता [अ० २७ तत्र श्लोकाः—मतिरासीन्महर्षीणां या या रसविनिश्चये । द्रव्याणि गुणकर्मभ्यां द्रव्यसंख्या रसाश्रयाः ॥ १०६ ॥ कारणं रससंख्या या रसानुरसलक्षणम् । परादीनां गुणानां च लक्षणानि पृथक् पृथक् ॥ १०७ ॥ पञ्चात्मकानां षट्त्वं च रसानां येन हेतुना । ऊर्ध्वानुलोमभाजश्च यद्गुणातिशयाद्रसाः ॥ १०८ ॥ षण्णां रसानां षट्त्वे च सविभक्ता विभक्तयः । उद्देशश्चापवादश्च द्रव्याणां गुणकर्मणी ॥ १०९ ॥ प्रवरावरमध्यत्वं रसानां गौरवादिषु । पाकप्रभावयोर्लिङ्गं वीर्यसंख्याविनिश्चयः ॥ ११० ॥ षण्णामास्वाद्यमानानां रसानां यत्स्वलक्षणम् । यद्यद्विरुध्यते तस्माद्येन यत्कारि चैव यत् । वैरोधिकनिमित्तानां व्याधीनामौषधं च यत् । आत्रेयभद्रकाप्यीये तत्सर्वमवदन्मुनिः ॥ ११२ ॥ रस-निश्चय सम्बन्ध में महर्षियों की भिन्न २ मति, द्रव्यों के गुण कर्म, रस की संख्या, इन के भेद होने के कारण, रस या अनुरस का लक्षण, पर आदि गुण एवं उन के लक्षण, पंच महाभूतों से उत्पन्न रसों की संख्या, कौन कौन द्रव्य ऊर्ध्वगामी, अधोगामी क्रिया करते हैं, छः रसों के विभाग, रसके आधार- भूत द्रव्यों के सामान्य गुण, कर्म और इनके अपवाद, गौरव, लघुता, रसों में उत्कृष्ट, मध्यम, अवर भेद, विपाक, प्रभाव का लक्षण, वीर्य कितने प्रकार का, छः रसों के लक्षण, परस्पर विरुद्ध द्रव्य, इन के सेवन से उत्पन्न विकार एवं इन रोगों की औषध ये सब विषय इस 'आत्रेय-भद्रकाप्यीय' अध्याय में आत्रेय ऋषि ने कह दिये ॥ १०६-११२ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थानेऽन्नपानचतुष्के आत्रेयभद्रकाप्यीयोऽध्यायः षड्विंशतितमः समाप्तः ॥ २६ ॥

सप्तविंशोऽध्यायः । अथातोऽन्नपानविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥