भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 356

३३८ चरकसंहिता [ अ० २७

त्रिदोषं बद्धविण्मूत्रं सार्षपं शाकमुच्यते ।
तद्वत्पिण्डालुकं विद्यात्कन्दत्वाच्च मुखप्रियम् ॥ १२१ ॥
सर्पच्छत्राफणश्याँस्तु बह्वयोऽन्याश्छत्रजातयः ।
शीताः पीनसकर्त्र्यश्च मधुरा गुर्व्य एव च ॥ १२२ ॥
चतुर्थः शाकवर्गोऽयं पत्रकन्दफलाश्रयः ।
शाकवर्ग-पाठा, शुषा ( सुशवी, ), कचूर, वास्तुक ( बथुआ ), सुनिषण्णक
( मेथी ) ये सब शाक ( भाजी ) ग्राहक, त्रिदोषनाशक हैं, परन्तु बथुआ की
भाजी ज़रा रेचक है । काकमाची ( मकोय ) की भाजी तीनों दोषों को नाश
करने वाली, पुष्टिदायक, और रसायन है, यह न तो बहुत गरम और न
बहुत ठण्डी है, मध्यमवीर्य, रेचक और कुष्ठनाशक है १ । राजक्षवक की
भाजी त्रिदोषनाशक, लघु, संग्राही है, ग्रहणी और अर्श रोग में विशेषतः हित-
कारी है । काल नामक शाक—कटु, अग्निदीपक, संयोगजन्य विषनाशक और
शोथनाशक, लघु, उष्ण, वायुकारक और रूक्ष है । खट्टी चांगेरी ( चौपतिया )
की भाजी—अग्निदीपक, उष्णवीर्य, संग्राही, कफ-वायु रोग में उत्तम तथा ग्रहणी
और अर्श रोग में हितकारी है। उपोदिका (चौलाई) मधुर रस मधुर विपाक, रेचक,
श्लेष्मावर्धक, वृष्य; स्निग्ध, शीतल और उन्मादनाशक (धत्तूरे आदि के मद को नष्ट
करनेवाली) है । तण्डुलीयका (चौलाई का भेद) रूक्ष, मद और विषनाशक, रक्तपित्त
रोग में श्रेष्ठ, मधुर रस, मधुर विपाक और शीतल है । मण्डूकपर्णी का शाक,
बेंत का अग्र भाग, कुचेला, वनतिक्ता, कंकोड़ा, अवल्गुजा ( बाबची ), परबल,
शकुनादनी, अडूसे के फूल, शार्ङ्गष्टा केम्बुक, कठिल्लक ( पुनर्नवा ), नाड़ी
( नाड़ीच ), कशाय ( मटर ), गोजिह्वा ( गाज़बां ), वार्त्ताक ( बैंगन ),
तिलपर्णी ( हुलहुल ), कुरुक ( करेला या परबल का भेद ), कर्कश ( अरुण-
दत्त के अनुसार कुचला, चक्रदत्त के अनुसार कर्कोटक ), नीम का शाक,
पित्तपापड़ा इन की भाजी कफ-पित्त नाशक, तिक्त, शीत और कटु विपाक है ।
'सूप्य शाक' ( माषपर्णी, उद्दपर्णी आदि ) फंजी ( ब्राह्मण, यष्टिका, भार्गी ),
चिल्छी २ कुतुम्बाक ( द्रोणपुष्पी, गोमा ), आलुक ( आलु, रतालु, पिण्डालु कन्द
मूल ), इन के पत्ते और कुटिंजर ( जंगली बथुआ ), सन, सिम्बल के फूल,
कर्बुदार ( कचनार ), सुवर्चला ( हुलहुल ), निष्पाव ( पालक ), कोविदार
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
१. सुश्रुत में काकमाची को—"तिक्ता काकमाची वातं शमयत्युष्णवीर्य-
त्वात् ।” उष्णवीर्य कहा है ।
२. 'चिल्छी'—'माषपर्ण्या शुनः पुच्छे चिल्छी स्याच्छाकलोप्रयो । - डनि० ।