चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५६ चरकसंहिता [ अ० २७ पीयूष ( ताजी ब्याई हुई मादा पशु का दूध, खीस ), मोरट ( यही पीयूष जब अगले दिन तक स्वच्छ नहीं होता, इसको मोरट कहते हैं ), किलाट ( जिसमें दूध से स्नेह भाग निकाल लिया जाय ) तथा इस प्रकार की अन्य वस्तुएं जिनकी अग्नि बढ़ी हुई हो, या जिनको अनिद्र रोग हो, उनके लिये सुखदायक हैं, गुरु, तृप्तिकारक, पौष्टिक, वीर्यवर्द्धक, वातनाशक हैं। छच्छ का छाना या पनीर ( छच्छ या दही को कपड़े में लटका कर उसका द्रव भाग निकाल देने पर बचा भाग ) स्वच्छ, गुरु, रूक्ष और संग्राही है। यह नवां गोरस का वर्ग समाप्त हुआ ॥ २१६-२३५ ॥ इति गोरसवर्गः । अथेक्षुवर्गः । वृष्यः शीतः स्थिरः स्निग्धो बृंहणो मधुरो रसः । श्लेष्मलो भक्षितस्येक्षोर्यान्त्रिकस्तु विदह्यते ॥ २३६ ॥ शैत्यात्प्रसादान्माधुर्यात्पौण्ड्रकाद्रांशको वरः ॥ प्रभूत-कृमि-मज्जासृङ् मेदो-मांस-करो गुडः ॥ २३७ ॥ क्षुद्रो गुडश्चतुर्भागत्रिभागार्धावशेषितः । रसो गुरुर्यथापूर्वं धौतः स्वल्पमलो गुडः ॥ २३८ ॥ यतो मत्स्यण्डिकाखण्डशर्करा विमलाः परम् । यथा यथैषां वैमल्यं भवेच्छैत्यं तथा तथा ॥ २३९ ॥ वृष्याः क्षीणक्षतहिताः सस्नेहा गुडशर्कराः । कषायमधुराः शीताः सतिक्ता याः सशर्कराः ॥ २४० ॥ रूक्षा वम्यतिसारघ्नी छेदनी मधुशर्करा । तृष्णासृक्पित्तदाहेषु प्रशस्ताः सर्वशर्कराः ॥ २४१ ॥ माक्षिकं भ्रामरं क्षौद्रं पौत्तकं मधुजातयः । माक्षिकं प्रवरं तेषां विशेषाद् भ्रामरं गुरु ॥ २४२ ॥ माक्षिकं तैलवर्णं स्यात् श्वेतं भ्रामरमुच्यते । क्षौद्रं तु कपिलं विद्याद् घृतवर्णं तु पौत्तिकम् ॥ २४३ ॥ वातलं गुरु शीतं च रक्तपित्तकफापहम् । संधातृ छेदनं रूक्षं कषायमधुरं मधु ॥ २४४ ॥ हन्यान्मधूष्णमुष्णार्तमथवा सविषान्वयात् । गुरु-रूक्ष-कषायत्वाच्छैत्याच्चाल्पं हितं मधु ॥ २४५ ॥