भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६३ ( हेमन्त धान्य ) धान्य से बनाये सक्तू, मधुर, लघु, शीतल होते हैं। वे संग्राही, रक्तपित्त, तृष्णा, वमन, और ज्वर के नाशक हैं ॥ २६१-२६२ ॥ हन्यात् व्यधीन् यवापूपो यावको वाट्य एव च ॥ २६३ ॥ उदावर्त-प्रतिश्याय-कास-मेह-गलग्रहान् । धानासंज्ञास्तु ये भक्ष्याः प्रायस्ते लेखनात्मकाः ॥ २६४ ॥ शुष्कत्वात्तर्षणाश्चैव विष्टम्भित्वाच्च दुर्जराः । विरूढधानाः शष्कुल्यो मधुक्रीडाः सपिण्डकाः ॥ २६५ ॥ पूपाः पूपलिकाद्याश्च गुरवः पैष्टिकाः परम् । जौ के पूड़े, जौ की बड़ियां, वाट्य, [ भूने जौ के चावल ], ये उदावर्त्त, प्रतिश्याय, कास, प्रमेह और गले के रोगों को मिटाती हैं। धाना (भूने जौ), प्रायः करके लेखन, कफ आदि के उखाड़ने वाले हैं। एवं शुष्क होने से प्यास लगाने वाले हैं। विष्टम्भी होने से देर में पचते हैं। विरूढ धाना (अंकुरित धान्य), शष्कुली (चावलों को पीसकर तिल मिलाकर तेल में पकाने से), मधुक्रीडा (पकाकर, घन बनाकर बीच में शहद रखने से), सपिण्डका (मधु क्रीड़ा, पूरन पोली), पूप (पूड़े), पूपलिका (मालपूआ; पापड़ा), ये अत्यन्त गुरु और पौष्टिक होते हैं ॥ २६३-२६५ ॥ फल-मांस-वसा-शाक-पलल क्षौद्र-संस्कृताः ॥ २६६ ॥ भक्ष्या वृष्याश्च बल्याश्च गुरवो बृंहणात्मकाः । वेशवारो गुरुः स्निग्धो बलोपचयवर्धनः ॥ २६७ ॥ गुरवस्तर्पणा वृष्याः क्षीरेक्षुरसपूपकाः । सगुडाः सतिलाश्चैव सक्षीरक्षौद्रशर्कराः ॥ २६८ ॥ वृष्या बल्याश्च भक्ष्यास्तु ते परं गुरवः स्मृताः । फल, मांस, वसा, शाक, पलल (तिल का चूर्ण), मधु इनके साथ बनाये खाद्य पदार्थ वीर्यवर्धक, बलकारक, गुरु और पौष्टिक हैं। वेशवार (मांस में से हड्डी निकाल कर पत्थर पर पिसकर पिप्पली, मरिच, गुड़ और घी के साथ पका देने पर वेशवार बनता है) गुरु, स्निग्ध, बलशक्तिवर्धक है। दूध और गन्ने के रस से तैयार किये खाद्य पदार्थ गुरु, तृप्तिकारक और वीर्यवर्धक है। गुड़, तिल, दूध और शर्करा से बनाये पदार्थ वीर्यवर्धक, बलकारक, और बहुत गुरु हैं ॥ २६६-२६८ ॥ सस्नेहाः स्नेहसिद्धाश्च भक्ष्या विविधलक्षणाः ॥ २६६ ॥ गुरवस्तर्पणा वृष्या हृद्या गौधूमिका मताः । संस्काराल्लघवः सन्ति भक्ष्या गोधूमपैष्टिकाः ॥ २७० ॥