चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ
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अ० २८ ] सूत्रस्थानम् ३७५
मनुष्य का खाया, पीया, चाटा या चबाकर हाथों से खाया भोजन, नाना
प्रकार का हितकारी पदार्थ, जाठराग्नि के प्रदीप्त बल के कारण, तथा पृथ्वी,
जल, तेज, वायु और आकाश इन पांच महाभूतों की अपनी-अपनी गरमी से
(पृथ्वी आदि के गुण वाले) आहार द्रव्यों का पाचन होता है । इस प्रकार से
पचा हुआ अन्न काल की भांति नित्य निरन्तर गति करता हुआ, सब धातुओं
के निरन्तर पाक होने से जिस शरीर में क्षीणता उत्पन्न होरही है उस शरीर की
तथा जिस शरीर में सब धातुओं की गरमी बनी हुई है, और वायुवह स्रोत
जिस शरीर में उपस्थित हैं, ऐसे सम्पूर्ण शरीर को वृद्धि करने के साथ साथ
बल, वर्ण, सुख और आयु देता है, तथा शरीर के धातुओं को तेज प्रदान
करता है । धातु ही जिनका भोजन है ऐसे रसादि धातु नित्य प्रति क्षीण होते
हुए लाये हुए भोजन रूपी धातु को लाकर स्वस्थ अवस्था में रहते हैं ॥ ३ ॥
तत्राऽऽहारप्रसादाख्यो रसः किट्टं च मलाख्यमभिनिर्वर्तते; किट्टात्
स्वेद-मूत्र-पुरीष-वात-पित्त-श्लेष्माणः कर्णाक्षि-नासिकास्य-लोम-कूप-प्रज-
नन-मलाः केश-श्मश्रु-लोम-नखादयश्चावयवाः पुष्यन्ति। पुष्यन्ति त्वाहार-
रसात् रस-रुधिर-मांस-मेदोऽस्थि-मज्ज-शुक्रौजंसि पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि धा-
तुप्रसादसंज्ञकानि शरीर-सन्धि-बन्ध-पिच्छादयश्चावयवाः ते सर्वे एव धा-
तवोमलाख्याः प्रसादाख्याश्च रसमलाभ्यां पुष्यन्तः स्वं मानमनुवर्तन्ते
यथावयः शरीरम्। एवं रसमलौ स्वप्रमाणावस्थितौ आश्रयस्य सम
धातोर्धातुसाम्यमनुवर्तयतः; निमित्ततस्तु क्षीणवृद्धानां प्रसादाख्यानां
धातूनां वृद्धिक्षयाभ्यामाहारमूलाभ्यां रसः साम्यमुत्पादयत्यारोग्याय,
किट्टं च मलानामेवमेव। स्वमानातिरिक्ताः पुनरुत्सर्गिणः शीतोष्णपर्य-
यगुणैश्चोपचर्यमाणा मलाः शरीरधातुसाम्यकराः समुपलभ्यन्ते। तेषां
तु मलप्रसादाख्यानां धातूनां स्रोतांस्ययनमुखानि; तानि यथाविभागेन
यथास्वं धातूनापूरयन्ति। एवमिदं शरीरमशित-पीत-लीढ-खादित-
प्रभवम्, अशित-पीत-लीढ-खादित-प्रभवाश्चास्मिन् शरीरे व्याधयो
भवन्ति; हिताहितोपयोगविशेषास्त्वत्र शुभाशुभविशेषकरा भव-
न्तीति ॥ ४ ॥
इस आहार से तीन वस्तुएं बनती हैं एक प्रसाद रूपी रस, २. किट्ट, आहार
भाग और ३. मल। इनमें किट्ट भाग के पसीना, मूत्र, मल, वायु, पित्त,
कफ और कान, आंख, नाक, मुख, रोम, कूप और शिश्न के मल उत्पन्न
होते हैं। तथा केश, दाढ़ी, मूंछ, रोम (शरीर के बाल) और नख आदि अङ्ग-