चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २८ ] सूत्रस्थानम् ३८१ स्तम्भ-सङ्कोच-खल्लीभिर्ग्रन्थि-स्फुरण-सुप्तिभिः ॥ २० ॥ मलानाश्रित्य कुपिता भेद-शोष-प्रदूषणम् । दोषा मलानां कुर्वन्ति सङ्गोत्सर्गमतीव च ॥ २१ ॥ विविधादशितात्पीताद्धिताल्लीढात्खादितात् । भवन्त्येते मनुष्याणां विकारा य उदाहृताः ॥ २२ ॥ तेषामिच्छन्ननुत्पत्तिं सेवेत मतिमान् सदा । हितान्येवाशितादीनि न स्युस्तज्जास्तथाऽऽमयाः ॥ २३ ॥ जिस समय अपथ्य आहार के कारण मल कुपित होकर इन्द्रियों में स्थित होते हैं, उस समय ये मल इन्द्रियों का नाश या इन्द्रियों को पीड़ित करने लगते हैं। ये मल वायु, शिरा, कण्डराओं में कुपित होकर मनुष्य को बहुत कष्ट पहुं- चाते हैं। इससे स्तम्भ, जड़ता, संकोच सिकुड़ना, खल्ली हाथ पांव का मुड़ जाना, ग्रन्थि (स्नायु आदि में गांठ), स्फुरण, धमन, और संज्ञानाश उत्पन्न होता है। जिस समय वात आदि दोष मलों का आश्रय लेकर कुपित होते हैं, उस समय मल का भेद (अतीसार) तथा मलों को सुखाना अथवा मलों के रंग को विकृत करना या मलों का अवरोध अथवा अतिप्रवृत्ति उत्पन्न कर देते हैं। जो रोग यहां पर लिखे हैं, वे नाना प्रकार के खान, पान, चाटन, खाद्य रूप आहार द्वारा मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं। ये रोग उत्पन्न न हों, इस इच्छा से मनुष्य सदा हितकारक आहार का सेवन करे, जिससे कि आहारजन्य रोग न होवें ॥ १६-२३ ॥ रसजानां विकाराणां सर्वं लङ्घनमौषधम् । विधिशोणितेकेऽध्याये रक्तजानां भिषग्जितम् ॥ २४ ॥ मांसजानां तु संशुद्धिः शस्त्रक्षाराग्निकर्म च । अष्टौनिन्दितेकेऽध्याये मेदोजानां चिकित्सितम् ॥ २५ ॥ अस्थ्याश्रयाणां व्याधीनां पञ्चकर्माणि भेषजम् । बस्तयः क्षीरसपोंषि तिक्तकोपहितानि च ॥ २६ ॥ मज्ज-शुक्र-समुत्थानामौषधं स्वादुतिक्तकम् । अन्नं व्यवायव्यायामौ शुद्धिः काले च मात्रया ॥ २७ ॥ शान्तिरिन्द्रियजानां तु त्रिमर्मीये प्रवक्ष्यते । स्नाय्वादिजानां प्रशमो वक्ष्यते वातरोगिके ॥ २८ ॥ न वेगान्धारणेऽध्याये चिकित्सासंग्रहः कृतः । मलजानां विकाराणां सिद्धिरुक्ता क्वचित्क्वचित् ॥ २९ ॥