चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८४ चरकसंहिता [अ० २८ यत्तु रोगसमुत्थानमशक्यमिह केनचित् । परिहर्तुं, न तत्प्राप्य शोचितव्यं मनीषिणा ॥ ४३ ॥ अज्ञानी मनुष्य बुद्धि के दोष से पञ्चेन्द्रियों के अहित शब्द, स्पर्शादि विषयों का सेवन करता है, मल मूत्रादि के वेगों को रोकता है, साहस के कामों को करता है, प्रारम्भ में सुखदायक और परिणाम में दुःखदायक कर्मों को करता है, इसलिये दुःख उठाता है। परन्तु ज्ञानी पुरुष ज्ञान द्वारा बुद्धि के स्वच्छ होने से इन कामों में नहीं फंसता, अतः सुखी रहता है । राग अर्थात् आसक्ति से (जानते हुए भी भोजन अहितकर है, फिर भी लालच से ) या अज्ञान से भोजन को नहीं खाना चाहिये, परीक्षा करके ज्ञानपूर्वक हितकारी अन्न को ही खाना चाहिये । क्योंकि शरीर आहार से उत्पन्न होता है। भोजन की शुभ-अशुभ परीक्षा के लिये आठ प्रकार की परीक्षा है । ये आठ परीक्षायें विमान स्थान अध्याय १ में प्रकृति-करण, संयोग आदि से कही हैं। भोजन की इन आठ विशेषताओं से परीक्षा करके भोजन करना चाहिये । जिन अपथ्यों से मनुष्य बच सकता हो उनसे बचने का सदा यत्न करना चाहिये, इस प्रकार करने से पुरुष अपराधरहित होता है और साधु पुरुषों में बुद्धिमान् गिना जाता है। क्योंकि प्रारब्ध से उत्पन्न व्याधि को साधु पुरुष बुरा नहीं मानते । जो रोग प्रारब्ध के बलवान् होने से उत्पन्न होता है वह यदि चिकित्सा कार्य के किये असाध्य भी हो तो भी बुद्धिमान् मनुष्य को शोक, चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ ३८-४३ ॥ तत्र श्लोकाः-आहारसंभवं वस्तु रोगाश्चाऽऽहारसंभवाः । हिताहितविशेषाच्च विशेषः सुखदुःखयोः ॥ ४४ ॥ सहत्वे चासहत्वे च दुःखानां देहसत्त्वयोः । विशेषो रोगसङ्ख्याश्च धातुजा ये पृथक् पृथक् ॥ ४५ ॥ तेषां चैव प्रशमनं कोष्ठाच्छाखा उपेत्य च । दोषा यथा प्रकुप्यन्ति शाखाभ्यः कोष्ठमेव च ॥ ४६ ॥ प्राज्ञाज्ञयोर्विशेषश्च स्वस्थातुरहितं च यत् । विविधाशितपीतीये तत्सर्वं संप्रकाशितम् ॥ ४७ ॥ यह शरीर आहार से उत्पन्न होता है, रोग भी आहार से उत्पन्न होते हैं। हित और अहित की विशेषता ही सुख दुःख में कारण है। दुःखों के सहन करने या न सहन कर सकने में देह, सत्त्व आदि विशेषतायें धातुजन्य पृथक् २ रोग, इनकी चिकित्सा, दोष जिस प्रकार से कोष्ठ से शाखा में जाकर कुपित