भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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१६६ चरकसंहिता [ अ० ३० हो, जो दूसरे के धन की इच्छा नहीं करता, सत्यवादी, शान्तमन (संतोषी), विचार कर कार्य करने वाला, उद्यमी, दूसरे को कष्ट न पहुंचावे, इस प्रकार से जो धर्म, अर्थ, काम का सेवन करता है, पूजा के योग्य पुरुषों का जो पूजन करता है, ज्ञान, विज्ञान, उपशम शील-स्वभाव का, वृद्ध पुरुषों का सत्संग (सेवा) करने वाला, राग, क्रोध, ईर्ष्या, मद, मान के बेगों को दमन करने वाला, निरन्तर नाना प्रकार के दान देने वाला, तप, ज्ञान में रत एवं सदा शान्त चित्त रहने वाला, आत्मा के चिन्तन में दत्तचित्त, इह लोक परलोक दोनों का ध्यान रखने वाला, उत्तम स्मरण शक्ति वाला जो पुरुष होता है, उसकी आयु हितकारी होती है, इससे विपरीत अहित है ॥ २३ ॥ प्रमाणमायुषस्त्वर्थे न्द्रिय-मनो-बुद्धि-चेष्टादीनां विकृतिलक्षणैरुपलभ्य- तेऽनिमित्तैः, इदमस्मात्क्षणान्मुहूर्ताद्दिवसात् त्रिपञ्चसप्तदशद्वादशाहात्प- क्षान्मासात्षण्मासात्संवत्सराद्वा स्वभावमापत्स्यत इति । तत्र स्वभावः, प्रवृत्तेरुपरमो, मरणमनित्यता, निरोध इत्येकोऽर्थः- इत्यायुषः प्रमाण- मतो विपरीतमप्रमाणम् । अरिष्टाधिकारे देहप्रकृतिलक्षणमधिकृत्य चोपदिष्टमायुषः प्रमाणमायुर्वेदे ॥ २४ ॥ प्रयोजनं चास्य- स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्र- शमनं च ॥ २५ ॥ आयु का प्रमाण, इन्द्रियों के विषय (शब्द स्पर्शादि) मन, बुद्धि, चेष्टा आदि के विकृत लक्षणों से जाना जाता है । लक्षण को देखकर यह कहा जा सकता है कि अमुक मनुष्य एक मुहूर्त में, एक क्षण में, एक दिन में, तीन दिन में, पांच दिन में, सात दिन में, बारह, पन्द्रह दिनों में महीने, छः मास में, या साल भर में स्वभाव अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। स्वभाव, प्रवृत्ति, उपरम, मरण, अनित्यता, निरोध ये शब्द एकार्थवाची पर्याय हैं। यह आयु का प्रमाण है, इसके विपरीत अप्रमाण । अरिष्टाधिकार (इन्द्रियस्थान) में देह, प्रकृति, लक्षणों के अधिकार से आयु का प्रमाण कहेंगे ॥ २४-२५ ॥ सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वात्स्वभावसंसिद्ध- लक्षणत्वाद्भावस्वभावनित्यत्वाच्च । न हि नामूतकदाचिदायुषः सन्तानो बुद्धिसन्तानो वा शाश्वतश्चाऽऽयुषो वेदिता, अनादि च सुखदुःखं सद्रव्य-हेतु-लक्षणमपरापरयोगात्; एष चार्थसंग्रहो विभाव्यते आयु र्वेदलक्षणमिति । गुरु-लघु-शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्षादीनां च द्वन्द्वानां सामान्यविशेषाभ्यां वृद्धिह्रासौ; यथोक्तम् । गुरुभिरभ्यस्यमानैर्गुरुणा- मुपचयो भवत्यपचयो लघूनामेवमेवेतरेषामित्येष भावस्वभावो नित्यः,