चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 423, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३० ] सूत्रस्थानम् ४०५ कुछ ऐसे भी मनुष्य हैं जो शास्त्र के थोड़े से भाग को पढ़कर विद्वानोंमें उत्पात करते हैं। सहसा उड़कर जिस प्रकार बटेर पक्षी उत्पात करने लगते हैं, उसी प्रकार ये अर्धपठित वैद्य भी उत्पात किया करते हैं। इसलिये प्रथम जल्प (वाद-विवाद में) तन्त्र, तन्त्रार्थ आदि आठ प्रश्नों को पूछना चाहिये। अपने से श्रेष्ठ या हीन की परीक्षा करने के लिये यही आठ प्रश्न असली शास्त्र को जानने वालों के बल हैं। थोड़े बल वाले, जिन्होंने शास्त्र का कुछ थोड़ा सा भाग ही देखा होता है वे इन प्रश्नों से इस प्रकार से भाग खड़े होते हैं जिस प्रकार धनुष की डोरी की टंकार से बटेरें भाग जाते हैं। जैसे कोई पशु निर्बल पशुओं में अपने को भेड़िया मानकर बोलने लगता है, परन्तु जब कोई बलवान् पशु सामने आ जाता है, तब वह पुनः अपने असली रूप में आजाता है, वह जो होता है वही बन जाता है। इसी प्रकार अपने मुख से प्रशंसा करने वाला मूर्ख मूर्खों में बैठकर अपना पाण्डित्य दिखाने लगता है, परन्तु जब कोई पण्डित विद्वान् सामने आखड़ा होता है, तब यह अबुद्धि मूढ़, अवहुश्रुत, कुण्डभेदी (दुष्ट- अध्योनि ), जड़ मूर्ख, वाद प्रतिवाद में क्या कहेगा ? कुछ भी नहीं। जिस प्रकार मकड़ी के जाल में फंसा कीड़ा कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार यह मूढ़ भी विद्वान् के सामने कुछ नहीं कर सकता ॥ ७१-७६ ॥ सद्वृत्तन विगृह्णीयाद्द्विषत्यल्पश्रुतैरपि । हन्यात्प्रश्नाष्टकेनादावितरांस्त्वात्ममानिनः ॥ ७७ ॥ दम्भिनो मुखरा ह्यज्ञाः प्रभूताबद्धभाषिणः । प्रायः प्रायेण सुमुखाः सन्तो युक्ताल्पभाषिणः ॥ ७८ ॥ तत्त्वज्ञानप्रकाशार्थमहङ्कारमनाश्रिताः । परन्तु जो निरभिमानी सच्चे वैद्य हों वे यदि थोड़े भी पढ़े लिखे हों तो भी उनके साथ शिष्टाचार, सम्मानपूर्वक बरतना चाहिये और जो आत्माभि- मानी हों उनको इन आठ प्रश्नों से परास्त करना चाहिये। ऐसे पुरुष प्रायः दम्भी, अपनी मुख से अपनी श्लाघा करने वाले, मूर्ख, बहुत एवं असम्बद्ध, प्रसंगरहित बोलने वाले होते हैं और जो अच्छे विद्वान् होते हैं वे थोड़ा और उचित प्रसंग में ही बोलते हैं, वे तत्त्वज्ञान का प्रकाश करने के लिये बोलते हैं और अहंकार का आश्रय नहीं लेते हैं ॥ ७७-७८ ॥ स्वल्पाधाराञ्छमुखरान्मर्षयेन्न विवादिनः ॥ ७९ ॥ परो भूतेष्वनुक्रोशस्तत्त्वज्ञाने परा दया । येषां तेषामसद्वादनिग्रहे निरता मतिः ॥ ८० ॥