भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० १ ] निदानस्थानम् ४१५ घ्राण-मुख-कण्ठोष्ठ-तालु-पाकः, ऊष्मा, तृष्णा, भ्रमः, मदः, मूर्च्छा, पित्तच्छ- र्दनमतीसारोऽन्नद्वेषः, सदनं, संस्वेदः, प्रलापः, रक्तकोठाभिनिर्वृत्तिः शरीरे, हरितहारिद्रत्वं नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरीष-त्वचामत्यर्थमुष्णत्वस्ती- व्रभावोऽतिमात्रं दाहः, शीताभिप्रायता, निदानोक्तानामनुपशयो, विप- रीतोपशयश्चेति पित्तज्वरलिङ्गानि भवन्ति ॥ ११ ॥ पित्त-ज्वर के लक्षण—यथा—सम्पूर्ण शरीर में एक साथ ( सहसा ) ज्वर का चढ़ना, अथवा ज्वर का बढ़ना; भोजन के पचने के समय, मध्यान्ह में, आधी रात में, शरद् ऋतु में, विशेष करके ज्वर बढ़ता है; मुख में कड़वापन; नासिका, मुख, कण्ठ, ओष्ठ, तालु का पकना; गरमी, प्यास का लगना, भ्रम, मद, मूर्च्छा, पित्त का वमन, अतिसार, अन्न में अनिच्छा, पसीना आना, प्रलाप, शरीर पर लाल लाल धब्बे वा चक्के, फुन्सियां निकलना, नख-आंख-मुख-मूत्र- मल-त्वचा इन का रंग हरा या हल्दी के समान हो जाना; गरमी बहुत बढ़ जाना, बहुत अधिक जलन होना, शीत वस्तुओं की चाह रहना और पित्त ज्वर के कारण रूप पदार्थों का अनुकूल न आना एवं विपरीत गुण वाले पदार्थों- का अनुकूल आना ये पित्तज्वर के लक्षण हैं ॥ ११ ॥ स्निग्ध-गुरु-मधुर-पिच्छिल-शीताम्ल-लवण-दिवास्वप्र-हर्षाऽव्यायामे- भ्योऽतिसेवितेभ्यः श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते । कफ प्रकोप के कारण—चिकनास, मीठे, भारी, शीतल, पिच्छिल, खट्टे नमकीन पदार्थों के अतिसेवन से, दिन में सोने से, हर्ष वा आनन्द के अति सेवन तथा व्यायाम के न करने से कफ प्रकुपित होता है । स यदा प्रकुपितः प्रविश्याऽऽमाशयमूष्मणा सह मिश्रीभूयाऽऽममाहा- रपरिणामधातुं रसनामानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि स्रोतांसि पिधाया- ग्निमुपहत्य पक्तिस्थानादूष्माणं बहिर्निरस्य प्रपीडयन् केवलं शरीरमनु- प्रपद्यते, तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति; तस्येमानि लिङ्गानि भवन्ति । कफज्वर की सम्प्राप्ति—कुपित कफ आमाशय में जाकर उष्णिमा के साथ मिलकर, अन्न के परिणाम भूत रस नामक धातु से मिल कर, रसवह और स्वेदवह स्रोतों को बन्द करके अग्नि को मन्द कर देता है । पक्वाशय से अग्नि को बाहर निकाल कर सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करता है । इस प्रकार से कफ ज्वर को उत्पन्न करता है । कफ ज्वर के लक्षण ये होते हैं । तद्यथा—युगपदेव केवले शरीरे ज्वरस्याभ्यागमनमभिवृद्धिर्वा । भुक्तमात्रे पूर्वाह्ने पूर्वरात्रे वसन्तकाले वा विशेषेण गुरुगात्रत्वमनन्ना-