चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३० चरकसंहिता [ अ० ३ व्यायाम आदि श्रमजनक कार्यों को अधिक मात्रा में करने-से, वायु प्रकुपित हो जाता है ॥ ६ ॥ स प्रकुपितो महास्रोतोऽनुप्रविश्य रौक्ष्यात्कठिनीभूतमाप्लुत्य पिण्डितोऽवस्थानं करोति हृदि वस्तौ पार्श्वयोर्नाभ्यां वा । स शूलमुप- जनयति ग्रन्थींश्चानेकविधान्, पिण्डितश्चावतिष्ठते, स पिण्डितत्वाद् गुल्म इत्युच्यते ॥ ७ ॥ वातगुल्म की सम्प्राप्ति—इस प्रकार से कुपित हुआ वायु महास्रोतों से घुस कर अपने रूक्ष गुण के कारण कठिन होकर कोष्ठ में फैलकर गोल-पिण्डाकार बन जाता है और हृदय, वस्तिभाग, दोनों पार्श्वभाग अथवा नाभि भाग में शूल अथवा अनेक प्रकार की गांठें उत्पन्न कर देता है। वायु गोलाकार बनकर पिण्डाकार होने से 'गुल्म' कहा जाता है। (इसी को 'वायुगोला' कहते हैं, जोकि वातगुल्म का अपभ्रंश है । ) ॥७॥ स मुहुराधमति, मुहुरणुत्वमापद्यते, अनियतविपुलाणुवेदनश्च भवति चलत्वाद्वायोः, पिपीलिकासंप्रचार इवाङ्गेषु, तोद-स्फुरणायाम- संकोच-सुप्ति-हर्ष-प्रलयोदय-बहुलस्तदातुरश्च सूच्येव शङ्कुनेव चाति- विद्धमात्मानं मन्यते, अपि च दिवसान्ते ज्वर्यते शुष्यति चाऽऽस्यम्, उ- च्छ्वासश्चोपरुध्यते । हृष्यन्ति चास्य रोमाणि वेदनायाः प्रादुर्भावे । वातगुल्म के लक्षण—यह वातगुल्म क्षण भर में फैलकर बड़ा हो जाता है और क्षण भर में सिकुड़कर छोटा हो जाता है, इसकी पीड़ा अनिश्चित, कभी अधिक और कभी कम हो जाती है। इसका कारण वायु का चंचल स्वभाव है, शरीर के अवयवों में कीड़ियों के चलने की सी प्रतीति होती है, इसमें तोद (चुभने की सी वेदना), स्फुरण ( धड़कन ), आयाम ( विस्तार ), संकोच (सिकुड़ना), सुप्ति ( स्पर्शज्ञान का अभाव ), हर्ष ( स्पर्शज्ञानका बढ़ना ), प्रलय ( नाश ), उदय ( जन्म ) प्रायः होते हैं अर्थात् कभी तो उत्पन्न होते हैं, और कभी शान्त हो जाते हैं। इस अवस्था में रोगी सुई चुभने या कील आदि से बिंधने का सा अनुभव करता है। सन्ध्याकालमें पीड़ा होती है, रोगी का मुख सूख जाता है, श्वास छुटने या बन्द होने लगता है, वेदना के समय शरीर रोमा- ञ्चित हो जाता है ॥ प्लीहाऽऽटोपान्त्र-कूजनाविपाकोदावर्त्ताङ्गमर्द-मन्या-शिरः-शङ्ख-शूल- ब्रध्नरोगाश्चैनमुपद्रवन्ति, कृष्णारुण-परुषत्वङ्-नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरी- षश्च भवति ।