भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ४ ] निदानस्थानम् ४४१

(२) इक्षुबालिकारसमेह— कफ के प्रकोप से अतिशय मधुर, शीतल, थोड़ा चिकास वाला, मैला, अस्वच्छ, गन्ने के रस के समान मूत्र करता है । यह 'इक्षुमेह' का रोगी है । (३) सान्द्रमेह— पहिले दिन का बरतन में रखा हुआ जिसका मूत्र, कफके कारण दूसरे दिन गाढ़ा हो जाता है, उसको 'सान्द्रमेह का रोगी समझना चाहिये । (४) सान्द्र-प्रसादमेह— कफप्रकोप के कारण मूत्र ऊपर जम जाये और नीचे थोड़ा-थोड़ा पतला रहे तो 'सान्द्रप्रसाद मेह' का रोगी समझना चाहिये । (५) शुक्लमेह— कफप्रकोप के कारण जो मनुष्य श्वेत, पिष्ठी के समान मूत्र बार बार करता है उसको 'शुक्लमेह' का रोगी समझना चाहिये । (६) शुक्रमेह— कफप्रकोप के कारण जो मनुष्य शुक्र के समान, या शुक्र से मिला, मूत्र बार-बार करता है उसको 'शुक्रमेह' का रोगी समझना चाहिये । (७) शीतमेह— जो मनुष्य कफप्रकोप से अत्यन्त शीतल, मीठा-मूत्र अधिकतर करता है, उसको 'शीतमेह' का रोगी जानना चाहिये । (८) सिकतामेह— कफप्रकोप से जब मनुष्य के मूत्र में सूक्ष्म, बालू के समान छोटे छोटे कठिन कण जाने लगते हैं, तब उसे 'सिकता-मेह' का रोगी समझना चाहिये । (९) शनैर्मेह— जब मनुष्य कफ के प्रकोप से धीरे-धीरे, बिना वेग के, कठिनाई से, मूत्र करता हो तब इसको शनैर्मेह का रोगी समझना चाहिये । (१०) आलाह्लमेह—जो मनुष्य कफ के प्रकोप से तारवाला या लार के समान चिकना मूत्र करता है तो इसको 'आलाह्लमेह' का रोगी समझना चाहिये ॥ १३-२२ ॥ इत्येते दश प्रमेहाः श्लेष्मप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ इस प्रकार से कफ के प्रकोप से उत्पन्न होने वाले दस प्रकार के प्रमेहों का वर्णन कर दिया है । उष्णाम्ल-लवण-क्षार-कटुकाजीर्ण-भोजनोपसेविनस्तथाऽतितीक्ष्णा- तपाग्नि-संताप-श्रम-क्रोध-विषमाहारोपसेविनश्च तथाऽऽत्मकशरीरस्यैव क्षिप्रं पित्तं प्रकोपमापद्यते ॥ २३ ॥ तत्प्रकुपितं तयैवाऽऽनुपूर्व्या प्रमेहानिमान् षट् क्षिप्रमभिनिर्वर्त- यति ॥ २४ ॥ तेषामपि च पित्तगुणविशेषेण नामविशेषा पूर्ववद् युक्ता भवन्ति । यथा— क्षारमेहश्च, कालमेहश्च, नीलमेहश्च, लोहितमेहश्च, मञ्जिष्ठा- मेहश्च, हारिद्रमेहश्चेति । ते षड्भिरेतैः क्षाराम्ल-लवण-कटुक-विस्त्रोष्णैः