भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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४५४ चरकसंहिता [ अ० ६ भेषजं कुरुते सम्यक् स चिरं सुखमश्नुते ॥ २१ ॥ यथा स्वल्पेन यत्नेन छिद्यते तरुणस्तरुः । स एवातिप्रवृद्धस्तु छिद्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥ २२ ॥ एवमेव विकारोऽपि तरुणः साध्यते सुखम् । विवृद्धः साध्यते कृच्छ्रादसाध्यो वाऽपि जायते ॥ २३ ॥ जो मनुष्य रोग के आरम्भ में 'साध्य' है ऐसा समझ कर उपेक्षा कर देता है, वह थोड़े समय पीछे ही मुर्दा होकर ( असाध्यावस्था में आकर ) ही चेतता है, और रोग के असाध्य होने पर ही उसकी नींद टूटती है । जो मनुष्य-रोग के आक्रमण से पूर्व ही या रोग की नवीन अवस्था में ही औषध उपचार कर लेता है, वह देर तक सुख ( जीवन ) का उपभोग करता है । जिस प्रकार थोड़े से परिश्रम से ही छोटा वृक्ष काटा जा सकता है, वही वृक्ष बड़ा होने पर बहुत परिश्रम से कटता है, इसी प्रकार नवीन अवस्था में रोग भी सुगमता से अच्छा हो जाता है और यही रोग बढ़ने पर कठिनाई से अच्छा होता है, अथवा असाध्य रूप में बदल जाता है ॥२०-२३॥ तत्र श्लोकाः-संख्या द्रव्याणि दोषाश्च हेतवः पूर्वरक्षणम् । रूपाण्युपद्रवाश्चोक्ताः कुष्ठानां कौष्ठिके पृथक् ॥ २४ ॥ इस कुष्ठनामक अध्याय में कुष्ठों की संख्या, द्रव्य, हेतु, दोष, पूर्वरूप, और उपद्रव ये सब विषय पृथक् पृथक् कह दिये हैं ॥ २४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने कुष्ठनिदानं नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ षष्ठोऽध्यायः । अथातः शोषनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब शोष के निदान की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥१-२॥ इह खलु चत्वारि शोषस्याऽऽयतनानि । तद्यथा-साहसं, संधा... क्षयो, विषमाशनमिति ॥ ३ ॥ शोष रोग के चार कारण होते हैं जैसे-( १ ) साहस, ( २ ) सन्...