भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 474

४५६ चरकसंहिता [ अ० ६ अरुचि, जो भाग कण्ठ में पहुँचता है, उससे कण्ठ नष्ट होता तथा स्वरभंग हो जाता है, जो भाग प्राणवह स्रोतों में पहुँचता है उससे श्वास और प्रतिश्याय उत्पन्न होते हैं और जो भाग शिर में पहुंचता है उससे शिरोरोग होता है ॥३॥ ततः क्षणाच्चैबोरसो विषमगतित्वाच्च वायोः कण्ठस्य चोद्ध्वं- सनात्कासः सततमस्य संजायते, स कासप्रसङ्गादुरसि क्षते शोणितं ष्ठीवति, शोणितागमाच्चास्य दौर्गन्ध्यमुपजायते, एवमेते साहसप्रभवाः साहसिकमुपद्रवाः स्पृशन्ति । ततः सोऽप्युपशोषणैरेतैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो मतिमान् बलमात्मनः समीक्ष्य तदनुरूपाणि कर्माण्यारहभेत कर्तुं, बलसमाधानं हि शरीरं, शरीरमूलश्च पुरुष इति ॥ ४ ॥ इसके अनन्तर छाती में व्रण होने और वायु की विषम गति होने से तथा कण्ठ के खर्खर बनने से निरन्तर कास (खाँसी), उत्पन्न हो जाता है । कास के होने से छाती में व्रण बनने से थूक में रक्त आ जाता है, रक्त के आने से दुर्गन्ध उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार से साहस करने वाले पुरुष को साहस से उत्पन्न होने वाले उपद्रव घेर लेते हैं । इन शुष्क करने वाले उपद्रवों से आक्रान्त होकर पुरुष भी धीरे-धीरे सूख जाता है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपने बल को देखकर तदनुसार कार्य का आरम्भ करे । बल के कारण ही शरीर अच्छे प्रकार से धारण किया जाता है और शरीर ही पुरुष अर्थात् आत्मा का मुख्य आश्रय है ॥ ४ ॥ भवति चात्र-साहसं वर्जयेत्कर्म रक्षञ्जीवितमात्मनः । जीवन् हि पुरुषस्त्विष्टं कर्मणः फलमश्नुते ॥ ५ ॥ अपना जीवन चाहने वाले पुरुष को साहस के कार्य छोड़ देने चाहिये, क्योंकि जीता हुआ पुरुष ही अपने कर्म का इष्टफल भोग सकता है ॥५॥ अथ संधारणं शोषस्याऽऽयतनमिति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः- यदा पुरुषो राजसमीपे भर्तृसमीपे वा गुरोर्वा पादमूले द्यूतसभामन्यं सतां समाजं स्त्रीमध्यं वाऽनुप्रविश्य यानैर्वाऽप्युच्चावचैरभियन् भयात् प्रसंगात् ह्रीमत्त्वाद् घृणित्वाद्रा निरुणद्ध्यागतानि वातमूत्रपुरीषाणि, तदा तस्य संधारणाद्वायुः प्रकोपमाद्यते । स प्रकुपितः पित्तश्लेष्माणौ समुदीर्योर्ध्वमधस्तिर्यक् च विहरति । तत्रग्दांशविशेषेण पूर्वं वयवविशेषं प्रविश्य शूलं जनयति, भिनत्ति पुरीषमुच्छोष पार्श्वे चातिरुजति, अंसौ चावमृद्नाति, कण्ठमुरश्चावधमति,