चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 479, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] निदानस्थानम् ४६१ बुद्धिमान् मनुष्य विषमाशन के कारण नाना प्रकार के कष्टदायक रोगों की उत्पत्ति को देखकर, हितकारक, परिमित और समय पर भोजन करने वाला और जितेन्द्रिय बने ॥ ११-१२ ॥ एवमेतैरैश्चतुर्भिः शोषस्याऽऽयतनैरभ्युपसेवितैर्वात-पित्त-श्लेष्माणः प्रकोपमापद्यन्ते, ते प्रकुपिता नानाविधैरुपद्रवैः शरीरमुपशोषयन्ति । तं सर्वरोगाणां कष्टतमत्वाद्राजयक्ष्माणमाचक्षते भिषजः । यस्माद्वा पूर्व- मासीद्भगवतः सोमस्योडुराजस्य तस्माद्राजयक्ष्मेति ॥ १३ ॥ राजयक्ष्मा शब्द की निरुक्ति—शोष रोग के कहे हुए इन चार कारणों के सेवन करने से, वात, पित्त, कफ ये तीनों दोष प्रकुपित हो जाते हैं । ये दोष कुपित होकर नाना प्रकार के उपद्रवों से शरीर का शोषण करते हैं । यह रोग सब रोगों में अधिक कष्टसाध्य है, इसलिये वैद्य लोग इस को 'राजयक्ष्मा' कहते है । अथवा यह क्षय पहले नक्षत्रराज चन्द्रमा को रहा, इसलिये इस का नाम 'राजयक्ष्मा' है ॥ १३ ॥ तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा—प्रतिश्यायः क्षवथुरभीक्ष्णं श्लेष्मप्रसेको मुखमाधुर्यमनन्नाभिलाषोऽन्नकाले चाऽस्यासो दोषदर्शन- मदोषेष्वल्पदोषेषु वा पात्रोदकान्न-सूपोपदंश-परिवेशकेषु मुक्तवतो हृल्ला- सस्तथोल्लेखनमाहारस्यान्तरान्तरा मुखस्य पादयोश्च शोषः पाण्योरवा- वेक्षणमत्यर्थमक्ष्णोः श्वेतावभासता चातिमात्रं बाहोश्च प्रमाणजिज्ञासा स्त्रीकामताऽतिघृणित्वं बीभत्सदर्शनता चास्य काये स्वप्ने चाभीक्ष्णं दर्शनमनुदकानामुदकस्थानानां, शून्यानां च ग्राम-नगर-निगमन-जनपदानां शुष्कदग्धावभग्नानां च वनानां कृकलास-मयूर-वानर-शुक-सर्प-काको- लूकादिभिः संस्पर्शनमधिरोहणं वा यानं च श्वोष्ट्र-खर-वराहैः केशास्थि- भस्म-तुषाङ्गार-राशीनां चाधिरोहणमिति शोषपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥१४॥ शोष के पूर्वरूप—शोष रोग के ये पूर्व रूप हैं । यथा—प्रतिश्याय (जुकाम), छींक आना, बार बार कफ का गिरना, मुख में मिठास, भोजन की अनिच्छा, भोजन करते समय थकान की प्रतीति, पात्र, पानी, अन्न, दाल, चटना, शाक आदि निर्दोष या अल्प दोषवाली वस्तुओं में भी दोष देखना, भोजन करते समय जी मचलाना, मुंह में पानी बहुत आना, खाये हुए अन्न का वमन होना, मुख और पांव का सूखना, हाथों को बहुत अधिक देखते रहना, आंखों का जाना ( रक्त की न्यूनता ), भुजाओं में मोटाई, जांचने की प्रवृत्ति, , अपने शरीर से घृणा या अपने शरीर में भयंकर रूप देखना