चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 48, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें३० चरकसंहिता [ अ० २ अजाजीं चाजगन्धां च पीलून्येलां हरेणुकाम् । पृथ्वीकां सुरसां श्वेतां कुठेरकफणिज्जकौ ॥ ४ ॥ शिरीषबीजं लशुनं हरिद्रे लवणद्वयम् । ज्योतिष्मतीं नागरं च दद्याच्छीर्षविरेचने ॥ ५ ॥ गौरवे शिरसः शूले पीनसेऽर्धावभेदके । क्रिमिव्याधावपस्मारे घ्राणनाशे प्रमोहके ॥ ६ ॥ अपामार्ग (चिरचिटे) के तण्डुल, पिप्पली, मरिच, वायविडंग, सहंजन के बीज, श्वेत सरसों, तेजबल के बीज, जीरा, अजमोदा (तिलवन), पीलू, एला (छोटी इलायची), हरेणु (रेणुका, मेंहदी के बीज), पृथ्वीका (कलौंजी), सुरसा (काली तुलसी), श्वेता (अपराजिता), कुठेरक (मरवा), फणिज्जक (तुलसी का भेद), शिरीष बीज (सिरस के बीज), लशुन (लहसन), दोनों हरिद्रा (हल्दी और दारु हल्दी), दोनों लवण (सैन्धव और सौवर्चल), ज्योतिष्मती (मालकंगनी), और नागर (सोंठ) ये शिरोविरेचन के लिये उपयोग में लानी चाहिये । इन उपरोक्त ओषधियों में 'श्वेता' और 'ज्योतिष्मती' ये दो द्रव्य 'मूलिनी' ओषधियों में गिने गये हैं। इसलिये इनका मूल ग्रहण करना चाहिये, और अपा- मार्ग (चिरचिटा) के तण्डुल उपयोग में लाने चाहिये । (गौरव) शिर के भारीपन में (शिरःशूल) शिर के दुखने में, (पीनस) नाक से दुर्गन्ध युक्त स्राव, कफ आता हो, (अर्द्धावभेदक) आधा शिर दुःखता हो, (कृमिव्याधि) कृमि जन्य शिरो रोग में, (अपस्मार) मृगी में, (घ्राण नाश) घ्राण शक्ति के नष्ट होने पर और (प्रमोहक) मूर्छा इन रोगों में शिरो विरेचन के रूप में प्रयोग करना चाहिये ॥ ३-६ ॥ वमनकारक द्रव्य— मदनं मधुकं निम्बं जीमूतं कृतवेधनम् । पिप्पलीकुटजेक्ष्वाकूण्येला धामार्गवाणि च ॥ ७ ॥ उपस्थिते श्लेष्मपित्ते व्याधावामाशयाश्रये । वमनार्थं प्रयुञ्जीत भिषग् देहमदूषयन् ॥ ८ ॥ मदन (मैनफल), मधुक (मुलहेठी), नीम (नीम की छाल), जीमूत (कडुवी तुरई), कृतबेधन (कडुवा तुम्बा), पिप्पली, कुटज (कुड़ा), इक्ष्वाकु (कडुवी घिया या आल), एला (छोटी इलायची) धामार्गव (तुरई