चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 485, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ७ ] निदानस्थानम् ४६७ वमन-विरेचनास्थापनानुवासनोपशमन-नस्तःकर्म-धूप-धूमपानाञ्जनाव- पीड-प्रधमनाभ्यङ्ग-प्रदेह-परिषेकानुलेपन-वध-बन्धनावरोधन-वित्रासन- विस्मापन-विस्मारणापतर्पण-सिरा-व्यधनानि भोजनविधानं च यथास्वं युक्त्या, यच्चान्यदपि किंचिन्निदानविपरीतमौषधं कार्यं तत्स्या- दिति ॥ १० ॥ उन्माद की चिकित्सा—इन तीन सिद्ध होने वाले उन्मादों की चिकित्सा निम्न प्रकार से करनी चाहिये। यथा—स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, उपशमन, नस्यकर्म, धूप, धूम्रपान, अञ्जन, अव- पीड़न, प्रधमन, अभ्यंग, प्रदेह, परिषेक, अनुलेपन, वध (मारने का भय दिखाना), बन्धन, अवरोधन (कमरे में बन्द करना), वित्रासन (डराना), विस्मारण (नाना प्रकार की बातों में भुलाना), विस्मापन (आश्चर्य से चकित करना), अपतर्पण (उपवास), सिराव्यधन (शिरा वेध आदि से रक्त बाहर करना) से चिकित्सा करनी चाहिये और युक्तिपूर्वक दोषों को देखकर अन्न- पान का स्वयं निश्चय करना चाहिये। इसके सिवाय और भी जो कोई औषध रोगजनक कारण के विपरीत, उसको शान्त करने वाली हो, वह भी अवश्य देनी चाहिये ॥ १० ॥ भवति चात्र—उन्मादान्दोषजान् साध्यान् साधयेद्भिषगुत्तमः । अनेन विधियुक्तेन कर्मणा यत्प्रकीर्तितम् ॥ ११ ॥ इति ॥ श्रेष्ठ वैद्य इस कही हुई विधि से दोषों से उत्पन्न साध्य उन्माद रोग को दूर करे ॥ ११ ॥ यस्तु दोषनिमित्तेभ्य उन्मादेभ्यः समुत्थान-पूर्वरूप-लिङ्ग-वेदनोप- शय-विशेष-समन्वितो भवत्युन्मादस्तमागन्तुमाचक्षते । केचित्पुनः पूर्वकृतं कर्माप्रशस्तमिच्छन्ति तस्य निमित्तं । प्रज्ञापराध एवेति भगवान्पुनर्वसुरात्रेय उवाच । प्रज्ञापराधाद्ध्वयं देवर्षि-पितृ-गन्धर्व- यक्ष-राक्षस-पिशाच-गुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्य-पूज्यानवमत्याहितान्याचरति, अन्यद्वा किंचित्कर्माप्रशस्तमारभते, तमात्मना हतमुपघ्नन्तो देवाद्यः कुर्वन्त्युन्मत्तम् ॥ १२ ॥ गन्तुज उन्माद—जो उन्माद दोषों से उत्पन्न होने वाले उन्माद से ण, वेदना और उपशय में भिन्न होता है, उस को कहते हैं। कुछ आचार्य पूर्वजन्म के अशुभ पाप कर्मों की उत्पत्ति मानते हैं। उस का कारण प्रज्ञापराध ही