भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 490

४७२ चरकसंहिता [नि० ८ उन्मादानां निदानेऽस्मिन् क्रियासूत्रं च भाषितम् ॥ २५ ॥ इति। 'उन्मादनिदान' नामक अध्याय में उन्माद रोग की संख्या, निमित्त, दो प्रकार के लक्षण, साध्य और असाध्य भेद और चिकित्सासूत्र ये सब बातें कह दी हैं ॥ २५ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने उन्मादनिदानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

अष्टमोऽध्यायः। अथातोऽपस्मारनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब 'अपस्मार-निदान' की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ इह खलु चत्वारोऽपस्मारा भवन्ति वात-पित्त-कफ-सन्निपात-नि- मित्ताः ॥ ३ ॥ अपस्मार रोग चार प्रकार का होता है। यथा—( १ ) वातजन्य, ( २ ) पित्तजन्य, ( ३ ) कफजन्य और ( ४ ) सन्निपातजन्य ॥ ३ ॥ त एवंविधानां प्राणिभृतां क्षिप्रमभिनिर्वर्तन्ते, तद्यथा—रजस्तमो- भ्यामुपहतचेतसामुद्भ्रान्तविषमबहुदोषाणां समलविकृतोपहितान्यशु- चीन्यभ्यवहारजातानि वैषम्ययुक्तेनोपयोगविधिनोपयुञ्जानानां तन्त्र- प्रयोगमपि च विषममाचरतामन्याश्च शरीरचेष्टा विषमाः समाचरता- मत्युपक्षीणदेहानां वा दोषाः प्रकुपिता रजस्तमोभ्यामुपहतचेतसामन्त- रात्मनः श्रेष्ठतममायतनं हृदयमुपसृत्य पर्यवतिष्ठन्ते, तथेन्द्रियायतनानि। तत्र चावस्थिताः सन्तो यदा हृदयमिन्द्रियायतनानि चेरिताः काम-क्रोध- भय-लोभ-मोह-हर्ष-शोक-चिन्तोद्वेगादिभिर्भूयः सहसाऽभिपुरयन्ति; तदा जन्तुरपस्मरति ॥ ४ ॥ निदान और सम्प्राप्ति—अपस्मार रोग निम्न प्रकार के पुरुषों में बहुत जल्दी होता है। यथा—जिन का मन रज और तम से युक्त होता है, जिन में दोष उद्भ्रान्त, विषम या बहुत बढ़े होते हैं, जिन का मन विक्षिप्त रह अपवित्र, मलिन, विरोधी वस्तुओं से मिश्रित, असंगत विधि से वाले, अनुचित विधि से उपयोग करने वाले, शास्त्र के विरुद्ध