चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४७४ चरकसंहिता [ अ० ८ वातजन्य अपस्मार के लक्षण - अपस्मार रोग के विशेष लक्षण ये हैं। यथा—रोगी बेसुध होकर शीघ्र ही थोड़े थोड़े समय में सचेत हो जाता है, आंखों का बहुत फैलना, व्यर्थ का बकवाद करना, मुख से झाग गिरना, ग्रीवा का भरा एवं जकड़ा रहना, शिर का टेढ़ा रहना ( शिर में बींधने के समान पीडा होना), अंगुलियों का विषम होना या मुड़ जाना, टांग, पांव और हाथ का चलाना ( इन में अस्थिरता ), नख, आंख, मुख और त्वचा का लाल, कठोर, खर्रा होना, चंचल, अस्थिर, कठोर, रूक्ष आदि रूप गिरते समय रोगी को दीखते हैं। वातकारक पदार्थों से रोग में वृद्धि और विरुद्ध पदार्थों से इस की शान्ति होती है, ये वातजन्य अपस्मार के लक्षण हैं ॥ ७ ॥ अभीक्षणमपस्मरन्तं क्षणे क्षणे संज्ञां प्रतिलभमानमवकूजन्तमास्फा- लयन्तं च भूमिं हरित-हारिद्र-ताम्र-नख-नयन-वदन-त्वचं रुधिरोक्षितोग्र- भैरव