भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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३१ विमानस्थानम् प्रथमोऽध्यायः । अथातो रसविमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इस के बाद 'रस-विमान' का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥१-२॥ इह खलु व्याधीनां निमित्त-पूर्वरूप-रूपोपशय-संख्या-प्राधान्यविधि- विकल्प-बल-काल-विशेषाननुप्रविश्यानन्तरं¹ रस-द्रव्य-दोष-विकार- भेषज-देश-काल-बल-शरीराहार-सार-सात्म्य-सत्त्व-प्रकृति-वयसां मान- मवहितमनसा यथावज्ज्ञेयं भवति भिषजा, रसादिमानज्ञानायत्तत्वात् क्रियायाः। न ह्यमानज्ञो रसदोषादीनां भिषक् व्याधिनिग्रहसमर्थो भवति। तस्मात् रसादिमानज्ञानार्थं विमानस्थानमुपदेक्ष्यामोऽग्निवेश ! ॥ ३ ॥ विमान-स्थान का प्रयोजन—चिकित्सा में सफलता चाहने वाले वैद्य को चाहिये कि सब से प्रथम रोगों का निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय, संख्या, प्राधान्य, विधि, विकल्प ( भेद ), बल, काल, विशेष (संख्या आदि पाँच, संप्राप्ति के भेद) को भली प्रकार जानकर, अनन्तर सावधान मन होकर मधुर आदि रस, द्रव्य (भेषज द्रव्य), वात आदि दोष, विकार, देश (भूमि और रोगी), काल (नित्य और आवधिक ), बल, शरीर, सार ( त्वग्, रक्त, ओज आदि ), आहार ( भोजन ), सात्म्य (ओकसात्म्य), सत्त्व (मन), प्रकृति (वात-आदि), वय ( काल के प्रमाण की अपेक्षा से बाल्यावस्था आदि ) आदि की रोग में भली प्रकार परीक्षा करे , क्योंकि चिकित्सा-क्रिया का आधार रसादि ज्ञान ही है । इस लिये रसादि का ज्ञान भली प्रकार करना चाहिये । रसादि को न जानने वाला वैद्य रोगों को रोकने और उन की चिकित्सा में सफल नहीं हो सकता । इसलिये हे अग्निवेश ! रसादि ज्ञान के अधीन चिकित्सा के होने से, रसादि ज्ञान के लिये विमान- [ ] उपदेश करेंगे ॥३॥ ¹उपदेशं' इति च पाठः ।

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