भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 520

५०२ चरकसंहिता [ अ० ३ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन द्विज वर्णों से बसे पांचाल क्षेत्र ( पंजाब ) के जनपद-मण्डल ( प्रान्त ) में, काम्पिल्य नाम राजधानी में शिष्यगण सहित भगवान् आत्रेय पुनर्वसु ग्रीष्म काल के द्वितीय अर्थात् ज्येष्ठ मांस में गंगा के किनारे वन में विहार करते हुए शिष्य अग्निवेश को बोले ॥ ३ ॥ दृश्यन्ते हि खलु सौम्य ! नक्षत्र-ग्रह-चन्द्र-सूर्यानिलानलानां दिशां चाऽप्रकृतिभूतानामृतुवैकारिका१ भावाः, अचिरादितो भूरपि च न यथा- वद्रस-वीर्य-विपाक-प्रभावमोषधीनां प्रतिविधास्यति,तद्वियोगाच्चाऽऽतङ्क- प्रायता नियता । तस्मात्प्रागुद्ध्वंसात्प्राक् च भूमेर्विरसीभावादुद्धरध्वं सौम्य ! भैषज्यानि यावन्नोपहत-रस-वीर्य-विपाक-प्रभावाणि भवन्ति । वयं चैषां रसवीर्यविपाकप्रभावानुपयोक्ष्यामहे, ये चास्माननुकाङ्क्षन्ति यांश्च वयमनुकाङ्क्षामः, नहि सम्यगुद्धृतेषु भैषज्येषु सम्यग्विहितेषु सम्यग्विचारितेषु जनपदोद्ध्वंसकराणां विकाराणां किंचित्प्रतीकारगौ- रवं भवति ॥ ४ ॥ हे सौम्य ! नक्षत्र ( अश्विनी आदि ), ग्रह ( बृहस्पति आदि ), चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि और दिशाओं के प्रकृति अर्थात् स्वाभाविक दशा में न होने पर ऋतु-विकार से उत्पन्न होनेवाले नाना परिणाम देखे जाते हैं। इधर पृथ्वी भी ओषधियो में रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव को शीघ्र उत्पन्न नहीं कर सकती, इसलिये प्रायः भयंकर रोगों का होना सम्भव होता है । अतः हे सौम्य ! जन- पदोद्ध्वंस अर्थात् देश भर को नाश कर देने वाले रोग होने से पूर्व तथा पृथ्वी के विरस ( रसहीन या विपरीत रसवाली ) होने से पूर्व ही औषधियों का संग्रह कर लो; जिस से कि इन ओषधियों के रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव सुरक्षित बने रहें, नष्ट न हों। हम इन ओषधियों के रस,वीर्य,विपाक और प्रभावका उपयोग करते हैं, जिन को हम चाहते हैं और जो हम को चाहते हैं, उनके लिये इन औषधियों का उपयोग करेंगे । ठीक समय पर ओषधियों के उखाड़ लेने पर, ठीक प्रकार से बना लेने पर और ठीक प्रकार से दोष आदि की अपेक्षा से प्रयोग करने पर जनपद-नाशक रोगों के प्रतीकार करने में कुछ भी कठिनाई नहीं होती ॥ ४ ॥ १. सुश्रुत में इस विकार को 'मरक' कहा है । यथा— शीतोष्णवर्षाणि खलु विपरीतान्योषधीर्व्यापादयन्ति, तासामुपयोगाद् विविध रोगप्रादुर्भावो मरको वा भवेत् ॥ सु० सूत्र० अ० ६