भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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५१४ चरकसंहिता [अ० ३ क्रियोपयोगं सम्यक् सर्वतियोगसंधारणमसंधारणमुदीर्णानां च गति- मतां साहसानां च वर्जनमारोग्यानुवृत्तौ हेतुमुपलभामहे उपदिशामः सम्यक् पश्यामश्चेति ॥ ४१ ॥ और भी, देश, काल, आत्मा इन के गुणों के सात्म्य, कर्म तथा आहार द्रव्यों को विधिपूर्वक उपयोग करना, काल, कर्म और इन्द्रियार्थों के अयोग, मिथ्यायोग और अतियोग का त्याग, अनुपस्थित वेगों को रोकना ( बलात्कार से बाहर न करना) और उपस्थित वेगों को न रोकना और सब प्रकार के साहसिक कर्मों (अनुचित बल के कार्यों) का त्याग, ये सब बातें आरोग्य के संरक्षण में कारण होती हैं। इस स्वस्थवृत्त का हम भली प्रकार उपदेश करते हैं और इसे अच्छी प्रकार देखते भी हैं ॥४१॥ अतः परमग्निवेश उवाच—एवं सत्यनियतकालप्रमाणायुषां भग- वन् ! कथं कालमृत्युरकालमृत्युर्वा भवतीति ॥४२॥ इस के अनन्तर अग्निवेश बोले ! इस प्रकार से यदि आयु का समय अनिश्चित है, तब कालमृत्यु और अकालमृत्यु किस प्रकार होती है ? ॥४२॥ तमुवाच भगवानात्रेयः—श्रूयतामग्निवेश ! यथा यानसमायुक्तोऽक्षः प्रकृत्यैवाक्षगुणैरुपेतः ( स्यात्, संच ) सर्वगुणोपपन्नो वाह्यमानो यथा- कालं स्वप्रमाणक्षयादेवावसानं गच्छेत्, तथाऽऽयुः शरीरोपगतं बल- वत्प्रकृत्या यथावदुपचर्यमाणं स्वप्रमाणक्षयादेवावसानं गच्छति, स मृत्युः काले। भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश सुनो ! जिस प्रकार गाड़ी में लगा अक्ष (धुरा), धुरे के समस्त गुणों से युक्त होने पर भी अधिक भार आदि के न पड़ने से, ठीक समय में अपने परिमाण के क्षय होने पर घिसता २ टूट जाता है, उसी प्रकार शरीर से सम्बद्ध आयु भी बलवान् प्रकृति, युक्ति तथा स्वस्थवृत्त- विधि से पाली हुई, अपने समय में ही क्षय को प्राप्त होती है, इस मृत्यु को 'कालमृत्यु' कहते हैं। यथा च स एवाक्षोऽतिभाराधिष्ठितत्वाद्विषमपथादपथादक्षचक्र- भङ्गाद्द्वाह्यवाहकदोषादणिमोक्षात् पर्यसनादनुपाङ्गाच्चान्तरा व्यसनम् धत्ते, तथाऽऽयुरप्ययथाबलमारम्भादयथाग्न्यभ्यवहरणाद्विषमाभ्यवहर- णाद्विषमशरीरन्यासादमैथुनादसत्संश्रयादुदीर्णवेगविनिग्रहाद्विधार्य वेगाविधारणाद् भूतविषवाय्वग्न्युपतापादभिघातादाहारप्रतीका- र्जनाच्च यावदन्तरा व्यसनमापद्यते। तथा नियतायुष अन्तरा