चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 541, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुकूलता से सात्म्य को, वेदना-विशेष से व्याधि के समुत्थान को, उपशय (शान्ति) और अनुपशय (निदान) द्वारा गूढ़लिंग वाले रोग को, जिस रोगके लक्षण छिपे हों (जैसे विद्रधि और गुल्म के भेद), उपचार विशेष (प्रकोपनके न्यूनाधिक होने से) दोषों के प्रमाण विशेष (न्यूनाधिक) को अरिष्ट लक्षणोंसे, आयु के क्षय को हितोपसेवन से, निकटवर्त्ती आरोग्यता के लक्षणों को अविकार (काम, क्रोधादि से रहित मानसिक विकारों) से निर्मल चित्त को जाने । ग्रहणी (अग्नि का स्थान, जठर) के मृदु दारुण भेद को रोगी के हित- अहित स्वप्न दर्शन से, भोजनादि में अभिप्राय (इच्छा) को, द्विष्ट, अप्रिय और इष्ट, प्रिय इनमें सुख और दुःख को रोगी के प्रश्नों से ही जान ले ॥ ११ ॥ भवन्ति चात्र—आप्तोपदेशेन प्रत्यक्षकरणेन च । अनुमानेन च व्याधीन् सम्यग्विद्याद्विचक्षणः ॥ १२ ॥ सर्वथा सर्वमालोच्य यथासंभवमर्थवित् । अथाध्यवस्येत्तत्त्वे च कार्ये च तदनन्तरम् ॥ १३ ॥ कार्यतत्त्वविशेषज्ञः प्रतिपत्तौ न मुह्यति । अमूढः फलमाप्नोति यदमोहनिमित्तजम् ॥ १४ ॥ ज्ञानबुद्धिप्रदीपेन यो नाऽऽविशति तत्त्ववित् । आतुरस्यान्तरात्मानं न स रोगांश्चिकित्सति ॥ १५ ॥ चतुर व्यक्ति आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष और अनुमान द्वारा रोगों की परीक्षा करे। अर्थवित् यथासम्भव सब रोगों की सब प्रकार से (तीनों प्रकार से) परीक्षा कर के निश्चय करे, इसके पीछे चिकित्सा कार्य करे । कार्यतत्त्व को जाननेवाला भिषक् रोग के चिकित्सा-कार्य में कभी भी मोह को प्राप्त नहीं होता । प्रमादरहित होकर ही मोह रहित होकर किये अनुष्ठान से उत्पन्न फल को प्राप्त करता है। जो योगवित् (प्रयोगों को जानने वाला) भिषक् (वैद्य) ज्ञान, बुद्धि रूपी प्रदीप की सहायता से रोगी के अन्दर तक नहीं पहुंचता (रोगी की सम्पूर्ण बातों को नहीं जानता), वह रोगोंकी चिकित्सा नहीं कर सकता ॥१२-१५॥ तत्र श्लोकौ—सर्वरोगविशेषाणां त्रिविधं ज्ञानसंग्रहम् । यथा चोपविशन्त्याप्ताः प्रत्यक्षं गृह्यते यथा ॥ १६ ॥ ये यथा चानुमानेन ज्ञेयास्तांश्चाप्युदारधीः । भावांश्चिरोगविज्ञाने विमानं मुनिरुक्तवान् ॥ १७ ॥ उपसंहार—सब रोगों का तीन प्रमाणों में संक्षेप, आप्तोपदेश द्वारा जो जो बातें जानी जाती हैं, प्रत्यक्ष द्वारा जो ग्रहण किया जाता है और जो बातें अनु-