भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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स्थूल और अणु (सूक्ष्म), दीर्घ और लता के समान फैले (कोई गोल, कोई लम्बे, कोई स्थूल और कोई सूक्ष्म) होते हैं ॥ ३१ ॥ प्राणोदकान्नवाहानां दुष्टानां श्वासिकी क्रिया। कार्या तृष्णोपशमनी तथैवाऽऽमप्रदोषिकी ॥ ३२ ॥ विविधाशितपीतीये रसादीनां यदौषधम्। रसादिस्रोतसां कुर्यात्तच्चथास्वमुपक्रमम्॥ ३३ ॥ मूत्र-विट्-स्वेद-वाहानां चिकित्सा मौत्रकृच्छ्रिकी। तथाऽतिसारिकी कार्या तथा ज्वरचिकित्सिकी॥ ३४॥ इति। प्राण, उदक और अन्नवाही स्रोतों के दुष्ट होने पर क्रम से श्वासिकी (अर्थात् हिक्का कास रोग में ही), श्वास को सुधारने वाली, तृष्णा-रोग नाशक और आम-दोषनाशक चिकित्सा करनी चाहिये। प्राणवाही स्रोतों में श्वासिकी उदकवाही में तृष्णाशमन और अन्नवाही में आम-प्रदोष नाशक चिकित्सा करनी चाहिये। 'विविधाशितपीतीय' अध्याय में रस से लेकर शुक्र तक दूषित धातुओं की जो चिकित्सा कही है, वही रसवह आदि दुष्ट स्रोतों की भी समझनी चाहिये। उनकी उसी प्रकार चिकित्सा करनी चाहिये। मूत्रवाही, मलवाही और स्वेदवाही स्रोतों के दूषित होने पर क्रमशः मूत्रकृच्छ्र रोग की, अतिसार रोग की तथा ज्वर की चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ३२-३४॥ तत्र श्लोकाः-त्रयोदशानां मूलानि स्रोतसां दृष्टिलक्षणम्। सामान्यं नाम पर्यायाः कोपनानि परस्परम् ॥ ३५॥ दोषहेतुः पृथक्त्वेन भेषजोद्देश एव च। स्रोतोविमाने निर्दिष्टस्तथा चाऽऽदौ विनिश्चयः ॥ ३६॥ केवलं विदितं यस्य शरीरं सर्वभावतः। शारीराः सर्वरोगाश्च स कर्मसु न मुह्यति ॥ ३७ ॥ तेरह प्रकार के स्रोतों के मूल, प्रत्येक के दूषित लक्षण, सब स्रोतों के सामान्य दूषित लक्षण, नाम, पर्याय, परस्पर कोपन, दोष का कारण, पृथक् २ औषध और उपक्रम ये सब बातें इस स्रोतो-विमान अध्याय में भगवान् आत्रेय ने कह दी हैं। जो भिषक् सम्पूर्ण शरीर के स्रोतों आदि को भली प्रकार जानता है और जिस को शारीरिक और मानसिक सब प्रकार के रोग ज्ञात हैं, वह चिकित्सा में कभी मोह को प्राप्त नहीं होता ॥ ३५-३७॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने स्रोतोविमानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥