चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 574, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें५५६ चरकसंहिता [अ० ८ (कर्मजन्य शुभ-अशुभ फल), देश एवं काल को जान कर तथा युक्ति को देख कर यदि वैद्य बनने की इच्छा करे तो सब से प्रथम शास्त्र की ही परीक्षा करे, क्योंकि वैद्यों के नाना प्रकार के शास्त्र लोक में प्रचलित हैं। इन में से जो शास्त्र निम्नलिखित गुणों वाला हो, उसे पढ़ने के लिये स्वीकार करे। शास्त्र के गुण—शास्त्र खूब बड़ा, असंक्षिप्त, यशस्वी, धीर पुरुषों से उप- सेवित, माननीय, थोड़े से शब्दों में बहुत अर्थ को बतलाने वाला, आप्त जनों से अनुमत (निर्दोष), उत्तम, मध्यम और अधम इन तीन प्रकार के शिष्यों की तीनों प्रकार की बुद्धि के लिये योग्य, सब जिस को समझ सकें, पुनरुक्ति दोष से रहित, ऋषियों से बनाया, सुप्रीत (अच्छी प्रकार ग्रथित किया हो), जिस में सूत्र (संक्षेप में अर्थों का ग्रहण) भाष्य (विस्तार से वर्णन), और प्रतिपाद्य विषयों को क्रम से कहा हो, सुन्दर अधिकरणों वाली, ग्राम्य शब्दों से रहित, कठिन दुर्बोध या बोलने में कठिन शब्दों से रहित, भली प्रकार से बहुत तत्त्व बतलाने वाला, (क्रम से उद्देश्य क्रम से अर्थों को बतलाने वाला), वस्तुतत्त्व को सन्देह से रहित, निश्चित तत्त्व को बतलाने वाला, संगतियुक्त अर्थों को बतलाने वाला, अव्यवस्थित, बेमेल मिले हुए प्रकरणों से रहित; सुनते ही स्पष्ट अर्थज्ञान कराने वाला, लक्षण और उदाहरण वाला हो, ऐसा शास्त्र अध्ययन के लिये चुनना चाहिये। क्योंकि जिस प्रकार बादल आदि से रहित, निर्मल सूर्य अन्धकार को दूर करके सब पदार्थों को प्रकाशित कर देता है उसी प्रकार शास्त्र अज्ञान को दूर करके सब अर्थ-तत्त्व को प्रकाशित कर देता है ॥ ३ ॥ ततोऽनन्तरमाचार्यं परीक्षेत। तद्यथा—पर्यवदातश्रुतं परिदृष्टक- र्माणं दक्षं दक्षिगं शुचिं जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वेन्द्रियोपपन्नं प्रकृ- तिज्ञं प्रतिपत्तिज्ञमनुपस्कृतविद्यमनहङ्कृतमनसूयकमकोपनं क्लेशक्षमं शिष्यवत्सलमध्यापकं ज्ञापनसमर्थं चेति। एवंगुणो ह्याचार्यः सुक्षेत्रमा- र्तवो मेघ इव सस्यगुणैः सुशिष्यमाशु वैद्यगुणैः संपादयति ॥ ४ ॥ आचार्य का लक्षण—शास्त्र की परीक्षा करने के अनन्तर आचार्य की परीक्षा करे। यथा-वह निर्मल शास्त्रज्ञान से सम्पन्न हो, जिसने कर्म को उचित रीति से देखा हो, केवल शास्त्र ही न पढ़ा हो, प्रत्युत वह कर्म में कुशल, शुचि (पवित्र), शस्त्र आदि क्रिया में वशी, सिद्धहस्त, नाना उपयोगी उपकरणों वाला सब इन्द्रियों से युक्त, रोगी की प्रकृति को पहिचानने वाला, उत्तम सूझ वाला, रोगों की चिकित्सा को समझने वाला, अन्य शास्त्रों के ज्ञान से प्रकट स्वच्छ विद्या वाला, अभिमान से रहित, गुणों में दोष न देखने वाला, क्रोध-