चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५५८ चरकसंहिता [अ० ८ प्रवेश करके, ( भली प्रकार समझ कर ) अपने अध्ययन के दोष को त्यागने और दूसरे के अध्ययन के दोषों के ज्ञान लिये एकान्त में बैठ कर अध्ययन करे। इस प्रकार से मध्याह्न और रात्रि में निरन्तर अध्ययन ( किसी दिन को भी बिना त्याग किये, ) प्रतिषिद्ध दिनों को छोड़कर, अभ्यास करे ॥ ७ ॥ अथाध्यापनविधिः—अध्यापने कृतबुद्धिराचार्यः शिष्यमादितः परीक्षेत । तद्यथा—प्रशान्तमार्यप्रकृतिमक्षुद्रकर्माणमृजुचक्षुर्मुखनासा- वंशं तनुरक्तविशदजिह्वमविकृतदन्तौष्ठममिन्मिणं धृतिमन्तममहङ्कृतिं मेधाविनं वितर्कस्मृतिसंपन्नमुदारसत्त्वं तद्विद्यकुलजमथवा तद्विद्यवृत्तं तत्त्वाभिनिवेशिनमव्यङ्गमव्यापन्नेन्द्रियं निभृतमनुद्धतवेशमन्यसनिनं शील-शौचाचारानुराग-दाक्ष्य-प्रादक्षिण्योपपन्नमव्यसनाभिकाममर्थवि- ज्ञाने कर्मदर्शने चानन्यकार्यमलुब्धमनलसं सर्वभूतहितेषिणमाचार्य सर्वा- नुशिष्टप्रतिकरमनुरक्तमेवंगुणसमुदितमध्याप्यमेवमाहुः । अब अध्यापन-विधि कहते हैं—पढ़ाने की इच्छा करने वाले आचार्य को सबसे प्रथम शिष्य की परीक्षा करनी चाहिये। यथा—शिष्य सौम्य आकृति, शान्त, नीच स्वभाव से रहित, कमीने स्वभाव का न हो, नीच कर्म न करने वाला, सरल मुख, आँख और नासिका वाला, पतली लाल वर्ण, स्पष्ट जिह्वा वाला, दांत और ओष्ठों के विकार से रहित, नाक से अनुनासिक न बोलने वाला, संतोषी या धैर्यवान्, अहंकार रहित, मेधावी, वितर्क ( ऊहापोह ) स्मृति (याददास्त) से युक्त, उदारचित्त वाला, वैद्यकुल में या वैद्य वृत्ति करने वाले माता पिता से उत्पन्न, वैद्य के समान आचार वाला, तत्त्व के ग्रहण में दत्तचित्त, अविकल अंगो वाला, सम्पूर्ण इन्द्रियों से युक्त, निभृत ( विनीत ), अनुद्धत, अर्थ-तत्त्व को विचारने वाला, अक्रोधी, व्यसनरहित, शील ( सच्चरित्रता ) शौच ( शुद्धि ) आचार, अनुराग ( पढ़ने से स्नेह ) रखने वाला, दक्षता, प्रादक्षिण्य सर्वत्र अनुकूलता इन गुणों से युक्त, कर्म दर्शन और अर्थ के जानने में अन्य कर्म रहित, दत्तचित्त लोभरहित, अप्रमादी, सब प्राणियों में मंगल कामना करने वाला, आचार्य के सब उपदेशों को यथावत् करने वाला और भक्तिमान् हो; इन गुणों से युक्त शिष्य को पढ़ाना चाहिये । ( इन गुणों से रहित शिष्य को पढ़ाने में आचार्य को भी यश नहीं मिलता ।) एवंविधमध्ययनार्थमुपस्थितमारिराधयिषुमाचार्यश्चानुभाषेत— अथोदगयने शुक्लपक्षे प्रशस्तेऽहनि तिष्य-हस्त-श्रवणाश्वयुजामन्यतमेन नक्षत्रेण योगमुपगते भगवति शशिनि कल्याणे; कल्याणे च करणे मैत्रे मुहूर्ते मुण्डः स्नातः कृतोपवासः कषायवस्त्रसंवीतः समिधोऽग्निमाज्य-