भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७६ विरुद्ध- जो वाक्य दृष्टान्त, सिद्धान्त और समय के विपरीत हो । यह विरुद्ध तीन प्रकार का है, दृष्टान्त-विरुद्ध, सिद्धान्त-विरुद्ध और समय-विरुद्ध । इनमें दृष्टान्त और सिद्धान्त दोनों को पीछे कह चुके हैं । समयविरुद्धम्-समय तीन प्रकार का है । यथा-(१) याज्ञिक समय, (२) आयुर्वेदिक समय और (३) मोक्षशास्त्रिक समय । इनमें आयुर्वेदिक-समय जैसे-भेषज चतुष्पाद (भिषक्, द्रव्य, उपस्थाता और रोगी) है । याज्ञिक- समय जैसे-यजमान को चाहिये कि पशुओं का आलम्भन करे। मोक्षशास्त्रिक समय जैसे-सब प्राणियों के प्रति अहिंसा वृत्ति रखे । इनमें अपने २ समय अर्थात् सिद्धान्त के विपरीत कहना 'विरुद्धम्' है । ये वाक्यदोष हैं ॥ ५४ ॥ अथ वाक्यप्रशंसा नाम यथा खल्वास्मिन्नर्थे त्वन्यूनमनधिकम- र्थवदनपार्थकमविरुद्धमधिगतपदार्थं चेति यत्तद्वाक्यमननुयोज्यमिति प्रशस्यते ॥ ५५ ॥ वाक्य प्रशंसा-जिस वाक्य में न्यून और अधिक दोष न हों, जो अर्थवान् होकर भी अनर्थक और विरुद्ध न हो और पदार्थ को कहने वाला तथा दूसरे से अनुयोज्य न हो ऐसा वाक्य प्रशंसायोग्य होता है, इसे वाक्यप्रशंसा कहते हैं । अथ च्छलं-छलं नाम परिशठमर्थाभासमनर्थकं वाग्वस्तुमात्रमेव तद्द्विविधं वाक्छलं, सामान्यच्छलं च । छल-शठ के प्रति वञ्चना के लिये अर्थ की भाँति दीखने वाले अनर्थक, वाणी मात्र को (दूसरे के वचन को नष्ट करने के लिये) प्रयुक्त करना 'छल' है । यह छल दो प्रकार का है * (१) वाक्छल और (२) सामान्य छल । तत्र वाक्छलं नाम यथा-कश्चिद् ब्रूयान्नवतन्त्रोऽयंभिषगिति । भिषग् ब्रूयाद्-नाहं नवतन्त्र एकतन्त्रोऽहमिति । परो ब्रूयात्-नाहं ब्रवीमि नवतन्त्राणि तवेति, अपितु नवाभ्यस्तं हि ते तन्त्रमिति । भिषग्ब्रूयात्- न मया नवाभ्यस्तं तन्त्रमनेकधाऽभ्यस्तं मया तन्त्रमिति । एतद्वाक्छलम् । इनमें वाक् छल-जैसे कोई कहे कि यह वैद्य तो नवतन्त्रों वाला है। वैद्य कहे कि मैं नव (नौ) तंत्रों वाला नहीं हूं । दूसरा व्यक्ति कहे कि मैं यह नहीं कहता कि तुम नौ तंत्रों वाले हो, अपितु तुमने तंत्रों का नया ही अभ्यास किया है । वैद्य कहे कि मैंने तन्त्रों का नया अभ्यास नहीं किया अपितु अनेक वार किया है; यह वाक्-छल है ।

  • न्यायदर्शन में 'तत् त्रिविधं वाक्छलं सामान्यच्छलमुपचारच्छलं च ।' न्याय० १ । २ । ५२ । 'धर्मविकल्पनिर्देशेऽर्थसद्भावप्रतिषेध उपचारच्छलम्' ॥ न्याय० १ । २ । ५५ ।