भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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५८६ चरकसंहिता [ अ० ८ स यदुत्तरं ब्रूयात्तत्परीक्ष्योत्तरं वाक्यं स्याद्यथोक्तं प्रतिवचनविधि- मवेक्ष्य; सम्यग्यदि तु ब्रूयात्, न चैनं मोहयितुमिच्छेद्, प्राप्तं तु वच- नकालं मन्येत काममस्मै ब्रूयादाप्तमेव निखिलेन ॥ ८४ ॥ इस पर जो उत्तर वह दे, उसकी परीक्षा करके, प्रतिवचन विधि के अनु- सार उचित उत्तर दे। यदि वह भली प्रकार से कहे और इसको चक्कर में डालकर चाहे तो इसके लिये सब कुछ विश्वस्त रूप से कह दे ॥८४॥ द्विविधा खलु परीक्षा ज्ञानवतां प्रत्यक्षमनुमानं च, एतद्धि द्वय- मुपदेशश्च परीक्षा स्यात् । एवमेषा द्विविधा परीक्षा, त्रिविधा वा सहोपदेशेन ॥ ८५ ॥ बुद्धिमानों के लिये परीक्षा दो प्रकार की है। प्रत्यक्ष और अनुमान (ये दोनों पहले कहे गये हैं) और तीसरी उपदेश भी परीक्षा है, इस प्रकार से यह दो प्रकार की परीक्षा उपदेश (आप्तोपदेश) के साथ तीन प्रकार की हो जाती है ॥ ८५ ॥ दशविधं तु परीक्ष्यं कारणानि यदुक्तमग्रे। तदिह भिषगादिषु संसार्य संदर्शयिष्यामः—इह कार्यप्राप्तेः कारणं भिषक्, करणं पुनर्भै- षजम्, कार्ययोनिर्धातुवैषम्यं, कार्यं धातुसाम्यं, कार्यफलं सुखावाप्तिः, अनुबन्धस्तु खल्वायुः, देशो भूमिरातुरश्च। कालः पुनः संवत्सरश्चाऽऽतु- रावस्था च। प्रवृत्तिः प्रतिकर्मसमारम्भः। उपायस्तु भिषगादीनां सौष्ठ- वमभिविधानं च सम्यक्। इहाप्यस्योपायस्य विषयः पूर्वेणैवो पाय विशे- षेण व्याख्यात इति कारणादीनि दश दशसु भिषगादिषु संसार्य संद- र्शितानि, तथैवाऽऽनुपूर्व्या एतद्दशविधं परीक्ष्यमुक्तम् ॥ ८६ ॥ पहिले यह कहा है कि परीक्ष्य (कारण आदि) वस्तु दस प्रकार की हैं। इसी को भिषग् आदि में घटाकर दिखाते हैं यहां कार्यप्राप्ति में कारण भिषक् है, औषध करण है। धातुओं की विषमता कार्ययोनि है। धातुओं को समान करना कार्य है। सुख का मिलना कार्यफल है। आयु अनुबन्ध है। भूमि और रोगी देश हैं। संवत्सर और रोगी की अवस्था काल है। प्रत्येक कर्म का आरम्भ करना प्रवृत्ति है। भिषग् औषध, परिचारक और रोगी इनका भली प्रकार से मेल उपाय है। यहाँ पर भी इस उपाय के सम्बन्ध में सब बातें पूर्वोक्त उपायविशेष के साथ कह दी हैं। धातुसाम्य रूपी कार्य के करने पर आरोग्यता निश्चित है। इस प्रकार से कारण आदि दसों को भिषग् आदि में घटाकर दिखा दिया है, इसी प्रकार क्रम से यह दश प्रकार का 'परीक्ष्य' कह दिया है ॥ ८६ ॥