भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०१ लेते हैं। मध्यम सत्त्व पुरुष तीव्र वेदना को असह्य देख कर वेदना में अपने को अपने आप रोकते हैं, अथवा दूसरे पुरुष इनको सम्भालते हैं। हीन सत्त्व वाले पुरुष स्वयं अपने को सम्भाल नहीं सकते और नहीं दूसरे इनको सम्भाल सकते हैं। ये हीनसत्त्व पुरुष बड़े शरीर वाले होकर भी थोड़ी सी पीड़ा को भी सहन नहीं कर सकते। ये पुरुष भय, शोक, लोभ, मोह, आभान, रौद्र, भैरव, द्विष्ट, बीभत्स और विकृत कथाओं में, और पशु-मनुष्य के मांस-रक्त आदि को देख कर विषाद , विवर्ण, मूर्च्छा, उन्माद, भ्रम, पतन इनमें से किसी एक के वश हो जाते हैं, अथवा मर जाते हैं ॥११६॥ आहारशक्तिश्चेति—आहारशक्तिरभ्यवहरणशक्त्या जरणशक्त्या च परीक्ष्या, बलायुषी ह्याहारायत्ते ॥ १२० ॥ आहार शक्ति से परीक्षा करनी चाहिये—आहार शक्ति की परीक्षा भोजन करने और उसको पचा लेने की शक्ति से करनी चाहिये। क्योंकि बल और आयु आहर के ही अधीन हैं ॥१२०॥ व्यायामशक्तिश्चेति—व्यायामशक्तिरपि कर्मशक्त्या परीक्ष्या कर्मशक्त्या ह्यनुमीयते बलत्रैविध्यम् ॥ १२१ ॥ व्यायाम शक्ति से परीक्षा करनी चाहिये—व्यायाम शक्ति की परीक्षा शरीर में परिश्रम उत्पन्न करने वाले कर्म से करनी चाहिये। कर्म शक्ति से तीनों प्रकार का प्रवर, मध्यम और अवर बल जाना जाता है ॥१२१॥ वयस्तश्चेति, कालप्रमाणविशेषापेक्षिणी हि शरीरावस्था वयोऽभि- धीयते । तद्वयो यथास्थूलभेदेन त्रिविधं—बालं मध्यं जीर्णमिति। तत्र बालमपरिपक्वधातुमाजातव्यञ्जनं सुकुमारमक्लेशसहमसंपूर्णबलं श्लेष्म- धातुप्रायमाषोडशवर्षं, विवर्धमानधातुगुणं पुनः प्रायेणानवस्थितसत्त्व- मात्रिंशद्वर्षमुपदिष्टं,मध्यं पुनः समत्वागत-बल-वीर्य-पौरुष-पराक्रम-ग्रहण- धारण-स्मरण-वचन-विज्ञान-सर्वधातु-गुणं बल-स्थितमवस्थितसत्त्वम- विशीर्यमाण-धातु-गुणं पित्त-धातु-प्रायमाषष्टिवर्षमुपदिष्टं अतः परं परि- हीयमानधात्विन्द्रिय-बल-वीर्य-पौरुष-पराक्रम-ग्रहण-धारणस्मरण-वचन- विज्ञानं भ्रश्यमानधातुगुणं वातधातुप्रायं क्रमेण जीर्णमुच्यते आब- र्षशतं, वर्षशतं खल्वायुषः प्रमाणमस्मिन्काले । सन्ति पुनरधिको- नवर्षशतजीविनो मनुष्याः। तेषां विकृतिवर्जैः प्रकृत्यादिबलविशेषै- रायुषो लक्षणतश्च प्रमाणमुपलक्ष्य वयसस्त्रित्वं विभजेत् ॥ १२२ ॥ आयु से परीक्षा करनी चाहिये—विशेष कालपरिमाण की अपेक्षा से शरीर