भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०३ जाता है। इसके अनन्तर औषध का भी तीक्ष्ण, मृदु और मध्य रूप से विभाग करके दोष एवं बल के औषध का प्रवर, मध्य और अवर रूप से प्रयोग करे ॥ १२३ ॥ आयुषः प्रमाणज्ञानेहेतोः पुनरिन्द्रियेषु जातिसूत्रीये च लक्षणान्यु- पदेक्ष्यन्ते ॥ १२४ ॥ आयु के प्रमाण को जानने के लिये लक्षण इन्द्रियस्थान में तथा शारीर स्थान के जातिसूत्रीय अध्याय में कहेंगे ॥ १२४ ॥ कालः पुनः संवत्सरश्चाऽऽतुरावस्था च । तत्र संवत्सरो द्विधा त्रिधा षोढा द्वादशधा भूयश्चाप्यतः प्रविभज्यते तत्तत्कार्यमभिसमीक्ष्य । तं तु खलु तावत्षोढा प्रविभज्य कार्यमुपदेक्ष्यते—हेमन्तो ग्रीष्मो वर्षाश्चेति शीतोष्णवर्षलक्षणास्त्रय ऋतवो भवन्ति । तेषामन्तरेष्वितरे साधारण- लक्षणास्त्रय ऋतवः प्रावृट्शरद्वसन्ता इति । प्रावृडिति प्रथमः प्रवृष्टेः कालः, तस्यानुबन्धो हि वर्षाः । एवमेते संशोधनमधिकृत्य षड् विभ- ज्यन्ते ऋतवः ॥ १२५ ॥ काल—संवत्सर और रोगी की अवस्था का नाम 'काल' है। इनमें संवत्सर अयन भेद से दो प्रकार का; शीत, उष्ण, वर्षा भेद से तीन प्रकार का, ऋतु विभाग से छः प्रकार का, मास भेद से बारह प्रकार का, पक्ष भेद से चौबीस प्रकार का, और दिन, प्रहरादि के भेद से अनेक प्रकार का है। कार्य की दृष्टि से इसका विभाग किया जाता है। यहां पर वर्ष का ऋतु विभाग से छः प्रकार का विभाग करके इसके कार्य को कहेंगे। हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा रूप से शीत, उष्ण और बरसात के लक्षणों वाली मुख्यतः तीन ऋतुओं के बीच में भी दूसरी साधारण लक्षणों वाली तीन ऋतुएं होती हैं। यथा—प्रावृट्, शरद् और वसन्त अर्थात् प्रवृष्टि इसका प्रथम प्रारम्भ काल होना 'प्रावृट्' है। इसका पिछला भाग वर्षा-ऋतु । इस प्रकार से संशोधनाधिकार में हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म, प्रावृट्, वर्षा और शरद् ये ऋतुएँ कह दी हैं ॥ १२५ ॥ तत्र साधारणलक्षणेष्वृतुषु वमनादीनां प्रवृत्तिर्विधीयते, निवृत्ति- रितरेषु । साधारणलक्षणा हि मन्दशीतोष्णवर्षत्वात् सुखतमाश्च भव- न्त्यविकल्पकाश्च शरीरौषधानां, इतरे पुनरत्यर्थशीतोष्णवर्षत्वादु दुःखतमाश्च भवन्ति विकल्पकाश्च शरीरौषधानाम् ॥ १२६ ॥ इनमें साधारण लक्षणों वाले समय में जब न बहुत शीत और न बहुत गरमी हो, जैसे प्रावृट्, शरद् और वसन्त ऋतु में वमन आदि कार्यों के करने