चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] सूत्रस्थानम् ४५ सिद्ध एवं ऋषियों से पूजित कृष्णात्रेय पुनर्वसु ने रोगों को नष्ट करने वाले बत्तीस सिद्ध योग जगत् के लाभ के लिये कहे हैं ॥ ३० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने भेषजचतुष्के आरग्वधीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः अथातः षड्विरेचनशताश्रितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे 'षड्विरेचन' से आरम्भ किये जाने वाले अध्याय का अवतरण करते हैं । भगवान् आत्रेय ने कहा है ॥ १-२ ॥ शरीर के लिये अन्तः परिमार्जन और बहिःपरिमार्जन की ओषधियों को पूर्व अध्यायों में कहकर अवशिष्ट परिमार्जन की ओषधियों को कहते हैं— इह खलु षड्विरेचनशतानि भवन्ति, षड् विरेचनाश्रयाः, पञ्च कषाययोनयः, पञ्चविधं कषायकल्पनं, पञ्चाशन्महाकषाया पञ्च कषायशतानि इति संग्रहः ॥३॥ इस तंत्र में छः सौ विरेचन योग हैं, न अधिक और न कम । 'विरेचन' शब्द उभयार्थ वाचक है । अर्थात् शरीर के अधोभाग से मल निःसारण का नाम भी विरेचन है और शरीर के ऊर्ध्व भाग से वमन के रूप में किये जाने वाले संशोधन रूप कर्म का भी 'विरेचन' कहते हैं । विरेचन द्रव्यों के छः आश्रय हैं, यथा—दूध, मूल, त्वचा, पत्र, पुष्प और फल । कषायों के पांच जातियां हैं ( इनमें लवण रस को छोड़ कर ) कषायों की कल्पना पांच प्रकार की है । पचास महाकषाय हैं, पांच सौ कषाय हैं । यह संक्षेप में कह दिया है ॥ ३ ॥ षड्विरेचनशतानीति यदुक्तं तदिह संग्रहेणोदाहृत्य विस्तरेण कल्पोपनिषद्यनुव्याख्यास्यामः ॥ ४ ॥ 'छः सौ विरेचन योग हैं' यह जो कहा है उसे यहां पर संक्षेप में कहेंगे । विस्तार से कल्प-उपनिषद् अर्थात् 'कल्प-स्थान' में व्याख्या करेंगे ॥ ४ ॥ त्र्यस्त्रिंशद्योगशतं प्रणीतं फलेषु, एकोनचत्वारिंशज्जीमूतकेषु योगाः, पञ्चचत्वारिंशदिक्ष्वाकुषु, धामार्गवः षष्ठिधा भवति योगयुक्तः, कुटज- स्त्वष्टादशधा योगमेति, कृतवेधनं षष्ठिधा भवति योगयुक्तं, श्यामात्र्रि-