चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 636, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंबहुविधशुभशब्दसन्धियुक्तं बहुविधवादनिषूदनं परेषां ॥ १५२॥ इमां मतिं बहुविधहेतुसंश्रयां विज्ञङ्गिवान्परमतवादसूदनीम् । न सज्जते परवचनावमर्दनेर्न शक्यते परवचनैश्च मर्दितुम् ॥ १५३॥ दोषादीनां तु भावानां सर्वेषामेव हेतुमत् । मानात्सम्यग्विमानानि निरुक्तानि विभागशः ॥ १५४ ॥ शास्त्र, आचार्य और शिष्य की परीक्षा, परीक्षा का कारण, अध्ययन और अध्यापन विधि, (शिष्य-आचार्य विधि), तद्विद्य संभाषाविधि, चवालीस वाद मार्ग, कारण, करण आदि दस पद, वमन आदि परीक्षार्थ, परीक्षा के प्रकार, तथा नौ प्रश्न इस रोग-भिषग्जितीय अध्याय में भगवान् आत्रेय ने पूर्णरूप से कह दिये हैं । बहुत प्रकार के वाक्यों से विचित्र, अर्थ में सुन्दर, बहुत प्रकार के शुभ शब्दों की संधि-योजना से बनाये, दूसरों के बहुत प्रकार के वाद को हटाने वाले नाना तत्त्व यहां पर भगवान् आत्रेय ने कहे हैं । नाना प्रकार की युक्ति से युक्त, दूसरों के मत को निराकरण करने वाली, यहां पर कही इस बुद्धि को जान कर वैद्य, दूसरों के वचनों का विमर्दन करने में समर्थ होता है । दूसरों के वचनों से पराजित नहीं हो सकता है । इनके ज्ञान से वैद्य सभा में वाक्चातुर्य से दूसरों को परास्त करता है, उनसे पराजित नहीं होता । विमान स्थान की निरुक्ति— दोष आदि सब भावों के युक्तिपूर्वक समस्त मान, एक-एक करके कह दिये हैं । दोष आदि का विशेष रूप से मान अर्थात् ज्ञान 'विमान' है । इस विमान का यहां पर उपदेश किया है, इसलिये इसको विमान-स्थान कहते हैं । इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने रोगभिषग्जितीय- विमानं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इति विमानस्थानं समाप्तम् । मु०—पं० बैकुंठनाथ भार्गव, आनन्दसागर प्रेस, गायघाट, बनारस ।