भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 66

४८ चरकसंहिता [ अ० ४ बृंहण के लिये हितकारी, ( लेखनीय ) देह के घर्षण के लिये, भेदनीय, संधानीय, दीपनीय अग्नि को बढ़ाने वाला यह छः कषायों का एक वर्ग हुआ । बल्यो वर्ण्यः कण्ठ्यो हृद्य इति चतुष्कः कषायवर्गः, । 'बल्य' ( बल कारक ), वर्ण्य ( शरीर की कान्ति बढ़ाने वाला ) 'कण्ठ्य' ( कण्ठ या गले के स्वर के लिये हितकारी ) 'हृद्य' ( हृदय—मन के लिये हितकारी ), यह दूसरा चार से बना हुआ कषाय वर्ग है । तृप्तिघ्नोऽर्शोघ्नः कुष्ठघ्नः कण्डूघ्नः कृमिघ्नो विषघ्न इति षट्कः कषायवर्गः, । 'तृप्तिघ्न' ( जब रोगी बिना खाये अपने को भरा पेट अनुभव करता है, उसके शिकायत को दूर करने वाला) 'अर्शोघ्न' (अर्श रोग में हितकारी), 'कुष्ठघ्न' (कुष्ठ रोगनाशक), 'कण्डूघ्न' (खाज नाशक ), 'कृमिघ्न' विषघ्न (क्रिमि तथा विष विनाशक ) यह तीसरा छः से बना कषाय वर्ग हुआ । स्तन्यजननः स्तन्यशोधनः शुक्रजननः शुक्रशोधन इति चतुष्कः कषायवर्गः । स्तन्य जनन ( दूध बढ़ाने वाला ), ( स्तन्यशोधन दूध का शोधन करने- वाला ), शुक्र जनन ( धातुवर्धक ), शुक्रशोधन ( धातु शोधक ), यह चौथा चार से बना कषाय वर्ग हुआ । स्नेहोपगः स्वेदोपगो वमनोपगो विरेचनोपग आस्थापनोपगोऽनु- वासनोपगः शिरोविरेचनोपग इति सप्तकः कषायवर्गः । स्नेहोपग १ ( मार्दव कर ), स्वेदोपग ( पसीना लाने वाला ), वमनोपग ( वान्तिकारक ), विरेचनोपग ( मलनिःसारक ), आस्थापनोपग ( रूक्ष बस्ति के लिये उपयोगी ), अनुवासनोपग ( स्नेह-बस्ति के लिये उपयोगी ), शिरो- विरेचनोपग ( नस्य के लिये उपयोगी ), यह सात कषायों से बना वर्ग । छर्दिनिग्रहणस्तृष्णानिग्रहणो हिक्कानिग्रहण इति त्रिकः कषायवर्गः। छर्दि-निग्रहण ( वमननाशक ), तृष्णानिग्रहण (प्यास को नष्ट करने वाला), हिक्कानिग्रहण ( हिचकी नाशक ), यह तीन से बना कषाय वर्ग हुआ। पुरीषसंग्रहणीयः पुरीषविरजनीयो मूत्रसंग्रहणीयो मूत्रविरजनीयो मूत्रविरेचनीय इति पञ्चकः कषायवर्गः । पुरीषसंग्रहणीय (मल को बांधने के लिये हितकारी), पुरीषविरजनीय (दोष के कारण जब मल में उचित रंग नहीं आता इसके लिये हितकारी जैसे— १'उपग'-का अर्थ सहायक जैसे-वमनोपग वमन कार्य में मदद देने वाला ।