भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 68

५० चरकसंहिता [ अ० ४ जैसे—जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुद्गपर्णी ( मूंगपर्णी ) माषपर्णी, जीवन्ती, और मधुक ( मुलैहटी ) ये दस जीवनीय ( जीवनवर्धक ) हैं ॥ क्षीरिणी राजक्षवकं बला काकोली क्षीरकाकोली वाट्यायनी भद्रौदनी भारद्वाजी पयस्यर्ष्यगन्धा इति दशेमानि बृंहणीयानि भवन्ति ॥ ( २ ) ॥ क्षीरिणी ( क्षीरविदारी ), राजक्षवक ( दूधी ), बला ( खरैंटी ), काकोली, क्षीरकाकोली, वाट्यायनी ( कंघी ), भद्रौदनी ( खिरैंटी ), भारद्वाजी ( उलट- कम्बल ), पयस्या ( विदारी कन्द ), ऋष्यगन्धा ( वृद्धदारक बिधारा ), ये दस बृंहणीय अर्थात् शरीर में ( वीर्य ) वृद्धि करने वाले हैं ॥ मुस्त-कुष्ठ-हरिद्रा-दारुहरिद्रा-वचातिविषा-कटुरोहिणी-चित्रक-चिर- बिल्व-हैमवत्य इति दशेमानि लेखनीयानि भवन्ति ॥ ( ३ ) ॥ मुस्त ( नागर मोथा ), कुष्ठ ( कूट ), हरिद्रा ( हल्दी ), वच ( घंड़ा- वच ), अतिविषा ( अतीस ), कटुरोहिणी ( कुटकी ), चित्रक ( चीता मूल ), चिरबिल्व ( करंज ), हैमवती ( श्वेत वच ), ये दस लेखनीय हैं ॥ सुवहाऽर्कोरूबूकाग्निसुखी-चित्रा-चित्रक-चिरबिल्व-शंखिनी-शकुलाद- नी-स्वर्णक्षीरिण्य इति दशेमानि भेदनीयानि भवन्ति ॥(४)॥ सुवहा (निशोथ), अर्क (आक दो प्रकार का है श्वेत और अरुण), उरुबूक ( एरण्ड ), अग्निसुखी ( कलिदारि ), चित्रा ( जमाल गोटे की जड़ ), चित्रक ( चीता मूल ), चिरबिल्व ( करंज ), शंखिनी, शकुलादनी ( कटुकी ), और स्वर्णक्षीरी ( सत्यानाशी ), ये दस भेदनीय हैं ॥ मधुक-मधुपर्णी-पृश्निपर्ण्याम्बष्ठा-समङ्गा-मोचरस-धातकी-लोध्र- प्रियङ्गु-कट्फलानीति दशेमानि संधानीयानि भवन्ति ॥ ( ५ ) ॥ मधुक ( मुलैहटी ), मधुपर्णी ( गिलोय ), पृश्निपर्णी ( पिठवन ), अम्बष्ठकी ( पाठा ), समंगा ( मजीठ ), मोचरस ( सिम्बल का गोंद ), धातकी ( धाय के फूल ), लोध्र ( पठानी लोध ), प्रियंगु ( फूल प्रियंगु ), और कट्फल ( काय- फल ), ये दस ‘संधानीय’ हैं ॥ पिप्पली-पिप्पलीमूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेराम्लवेतस-मरिचाजमो- दा-भल्लातकास्थि-हिङ्गुनिर्यासा इति दशेमानि दीपनीयानि भवन्ति (६) इति षट्कः कषायवर्गः ॥ [ १ ] ॥ पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य ( चविका ), चीतामूल, शृंगबेर ( सोंठ या