चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५५ त्रिवृद्-बिल्व-पिप्पली-कुष्ठ-सर्षप-वचा- वत्सकफल-शतपुष्पा-मधुक- मदनफलानीति दशेशान्यास्थापनोपगानि भवन्ति ॥ ( २५ ) ॥ त्रिवृत् (निशोथ), बिल्व (बेलगिरी), पिप्पली, कुष्ठ (कूठ), सर्षप (सरसों), वच, वत्सक फल (इन्द्र जौ), शतपुष्पा (सौंफ), मधुक (मुले- हठी) मदनफल (मैनफल) ये दस 'आस्थापनोपग' अर्थात् रूक्ष बस्ति के लिये उपयोगी हैं ॥ रास्ना-सुरदारु-बिल्व-मदन- शतपुष्पा-वृश्चीर-पुनर्नवा-श्वदंष्ट्राग्नि- मन्थ-श्योनाका इति दशेशान्यनुवासनोपगानि भवन्ति ॥ ( २६ ) ॥ रास्ना, सुरदारु (देवदारु), बिल्व (बेलगिरी), मदन (मैनफल), शतपुष्पा (सौंफ), वृश्चीर (श्वेत पुनर्नवा), पुनर्नवा (रक्त पुनर्नवा), श्वदंष्ट्रा (गोखरू), अग्निमन्थ (अरणी की छाल), श्योनाक (टंटू की छाल) ये दस 'अनुवासनोपग' अर्थात् स्नेहवस्ति के लिये उपयोगी हैं ॥ ज्योतिष्मती-क्षवक-मरिच-पिप्पली-विडङ्ग-शिग्रु-सर्षपापामार्गतण्डुल- श्वेता-महाश्वेता इति दशेशानि शिरोविरेचनापगानि भवन्ति ॥ (२७) ॥ इति सप्तकः कषायवर्गः ॥ [ ५ ] ॥ ज्योतिष्मती (माल कंगनी), क्षवक (नकछिंकनी), मरिच, पिप्पली, विडंग (वायविडंग), शिग्रु (सहजन), सर्षप (सरसों), अपामार्गतण्डुल (चिरचिटे के चावल), श्वेता (अपराजिता श्वेत कोयला), और महाश्वेता (श्वेता का भेद) ये दस 'शिरो-विरेचनोपग' अर्थात् शिरोविरेचन के लिये उपयोगी हैं ॥ यह सात का एक 'कषायवर्ग' हुआ । जम्ब्वाम्रपल्लव - मातुलुङ्गाम्लबदर - दाडिम-यव-यष्टिकोशीर-मृत्लाजा इति दशेशानि छर्द्दिनिग्रहणानि भवन्ति ॥ ( २८ ) ॥ जम्बू (जामुन); और आम्र (आम), इनके पल्लव (पत्ते); मातुलुंग (बिजोरिया-नींबू), अम्ल बदर (खट्टे बेर,), दाडिम (अनार), यव (जौ), यष्टिका (मुलैहठी), उशीर (खस), मृत् (सौराष्ट्र देश की मिट्टी), और लाजा (खीलें) ये दस 'छर्द्दिनिग्रहण' वमन को रोकती हैं ॥ नागर-धन्वयासक-मुस्त-पर्पटक-चन्दन-किराततिक्तक-गुडूची-ह्रीबे- र-धान्यक-पटोलानीति दशेशानि-तृष्णानिग्रहणानि भवन्ति ॥ ( २६ ) ॥ नागर (सोंठ), धन्वयासक (धमासा), मुस्त (नागरमोथा), पर्पटक (पित्तपापड़ा), चन्दन (लाल चन्दन), किराततिक्तक (चिरायता), गुडूची