चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें६० चरकसंहिता [ अ० ४ ( ब्राह्मी ), गोलोमी ( वच या दूर्वा ), जटिला (जटामांसी), पलंकषा (गुग्गुलु), अशोकरोहिणी (कुटकी) ये दस 'संज्ञा-स्थापन' अर्थात् संज्ञा उत्पन्न करते हैं ॥ ऐन्द्री-ब्राह्मी-शतवीर्या-सहस्रवीर्यामोघाव्यथा-शिवारिष्टा-वाट्यपुष्पी- विष्वक्सेनकान्ता इति दशेमानि प्रजास्थापनानि भवन्ति ॥(४६)॥ ऐन्द्री, ब्राह्मी, शतवीर्या ( शतावरी ), सहस्रवीर्या ( महाशतावरी ),अमोघा ( आंवला ), अव्यथा ( गिलोय ), शिवा ( हरीतकी ), अरिष्टा ( कुटकी ), वाट्यपुष्पी ( खरैंटी ), विष्वक्सेनकान्ता ( प्रियंगु ) ये दस 'प्रजास्थापन' अर्थात् संतति जनक हैं ॥ अमृताभया-धात्री-मुक्ता-श्वेता-जीवन्त्यतिरसामण्डूकपर्णी-स्थिरा- पुनर्नवा इति दशेमानि वयःस्थापनानि भवन्ति ॥ (५०) ॥ इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ [ १० ] ॥ अमृता ( गिलोय ), अभया ( हरड़ ), धात्री ( आंवला ), मुक्ता ( रास्ना ), श्वेता ( अपराजिता ), जीवन्ती, अतिरसा ( शतावरी ), मण्डूकपर्णी स्थिरा ( शालपर्णी ), और पुनर्नवा ये दस औषधि 'वयःस्थापन' अर्थात् वय को टिकाती है ॥ यह पाँच से बना हुआ कषाय वर्ग है । इति पञ्चकषायशतान्यभिसमस्य पञ्चाशन्महाकषायाः, महतां च कषायाणां लक्षणोदाहरणार्थं व्याख्याता भवन्ति ॥१४॥ इस प्रकार से ( प्रत्येक द्रव्य के गिनने से ) पाँच सौ ( ५०० ) कषाय पूर्ण हो जाते हैं, एवं पचास ( ५० ) 'महाकषाय' भी हो जाते हैं। इन कषायों के लक्षण उदाहरण भी कह दिये गये हैं ॥१४॥ न हि विस्तरस्य प्रमाणमस्ति, न चाप्यतिसंक्षेपोऽल्पबुद्धीनां साम- र्थ्यायोपकल्पते,तस्मादनतिसंक्षेपेणानतिविस्तरेण चोपदिष्टाः। एतावन्तो ह्यलमल्पबुद्धीनां व्यवहाराय बुद्धिमतां च स्वालक्षण्यानुमानयुक्तिकुश- लानामनुक्तार्थज्ञानायेति ॥ १५ ॥ फैलाव की सीमा नहीं है और बहुत थोड़े में कहे हुए अर्थ को थोड़ी बुद्धि वाले नहीं समझ सकते । इसलिये न तो बहुत संक्षेप में और न बहुत विस्तार से यहाँ कहा है । यहां पर जितना भी कहा है वह थोड़ी बुद्धिवालों के व्यवहार चलाने के लिये है ओर जो लक्षण अनुमान, युक्ति में निपुण हैं, उन बुद्धिमानों के लिये न कहे हुए अर्थ को जानने के लिये सहायक होगा ॥१५॥ एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—नैतानि भगवन् !