भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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६२ चरकसंहिता [ अ० ५ लक्षणार्थं, प्रमाणं हि विस्तरस्य न विद्यते ॥ २१ ॥ न चालमतिसंक्षेपः सामर्थ्यायोपकल्पते । अल्पबुद्धेरयं तस्मान्नातिसंक्षेपविस्तरः ॥ २२ ॥ मन्दानां व्यवहाराय बुधानां बुद्धिवृद्धये । पञ्चाशत्को ह्ययं वर्गः कषायाणामुदाहृतः ॥ २३ ॥ तेषां कर्मसु बाह्येषु योगमाभ्यन्तरेषु च । संयोगं च प्रयोगं च यो वेद स भिषग्वरः ॥ २४ ॥ इस विषय में श्लोक हैं— जिन द्रव्यों में से (छः सौ) विरेचन योग होते हैं वे एवं विरेचन योगों के छः आश्रय भी संक्षेप से कह दिये हैं । लवण ( नमक ) को छोड़कर शेष पांच रसोंकी 'कषाय' संज्ञा है । इसलिये कषायों की पांच प्रकार की योनि कही हैं ! एवं इन पांच कषायों की पांच प्रकार की कल्पना ( बनावट ) भी कह दी है और पचास प्रकार के 'महाकषाय' कहे हैं । कषायों के पांच सौ प्रकार भी दिग्दर्शन के लिये, न तो बहुत विस्तार से और न बहुत संक्षेप में कहे हैं । वे थोड़ी बुद्धि वालों को काम देने के लिये पर्याप्त हैं । इसलिये न विस्तार किया है और न बहुत संक्षेप । मन्द बुद्धिवाले व्यवहार कर चला सकें, और बुद्धिमान् की प्रतिभा बढ़ाने के लिये पांच सौ कषायों का वर्ग कह दिया । इन कषायों का बाह्य कर्मों तथा आभ्यन्तर प्रयोगोंमें संयोग, और प्रयोग (योजना) को जो जानता है वह उत्तम वैद्य है१ । १८-२४। इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने भेषजचतुष्के षड्विरेचनशताश्रितीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ इति भेषजचतुष्कः ॥ १ ॥ अथ पञ्चमोऽध्यायः । अथातो मात्राशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ १-बाह्य प्रयोग प्रलेप आदि में, अन्तःप्रयोग वमन आदि कार्यों में स्वस्थ एवं आतुर दोनों व्यक्तियों के लिये करने में समर्थ एवं संयोग मिश्रण अयोगिक, हानिकारक अनुचित औषधियों को योग में से निकाल देना एवं उचित को न कहने पर भी मिश्रण करना, प्रयोग देश, काल, प्रकृति, व्याधि, रोगी, बल आदि को देख कर योजना करना जो जानता है, वही उत्तम वैद्य है ।