चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७३ न रक्ती न विषेणार्त्तो न शोचन्न च गर्भिणी । न श्रमे न मदे नामे न पित्ते न प्रजागरे ॥ ४० ॥ न मूर्च्छाभ्रमतृष्णासु न क्षीणे नापि च क्षते । न मद्यदुग्धे पीत्वा च न स्नेहं न च माक्षिकम् ॥ ४१ ॥ धूमं न भुक्त्वा दध्ना च न रूक्षः क्रुद्ध एव च । न तालुशोषे तिमिरे शिरस्यभिहते न च ॥ ४२ ॥ न शङ्खके न रोहिण्यां न मेहे न मदात्यये । एषु धूममकालेषु मोहात्पिबति यो नरः ॥ ४३ ॥ रोगास्तस्य प्रवर्धन्ते दारुणा धूमविभ्रमात् । इसके आगे कहेंगे कि किन २ पुरुषों के लिये धूम पान निन्दित है। 'विरिक्त' विरेचन जिसने लिया हो, वस्ति कर्म (रूक्ष या स्नेहन वस्ति जिसने ली हो ), रक्ती ( रक्त दोष वाला ), विषार्त्त ( विष से पीड़ित ), शोचन् (शोकातुर मनुष्य ), गर्भिणी ( गर्भवती ), श्रम ( थकान चढ़ा होने पर ), मद ( नशा किया हुआ होने से पर ) आम ( अजीर्णावस्था में ), प्रजागर ( रात्रि में जागने पर ), मूर्च्छा (बेहोशी ), भ्रम ( चक्कर आना ), तृष्णा ( प्यास लगी होने पर ), क्षीण ( धातु क्षय होने पर ), क्षत ( उरः क्षत रोग में ), मद्य ( शराब पीकर ), दुग्ध ( दूध पीकर ), स्नेह ( घी तैल आदि पीकर ), माक्षिक ( शहद खाकर ), दही के साथ चावल आदि खाकर रूक्ष ( रूक्ष शरीर में रूखापन होने पर स्नैहिक धूम के अतिरिक्त धूम ), क्रुद्ध ( कोप की अवस्था में ), तालु शोष ( गला सूख जाने पर ), तिमिर ( तिमिर नामक अक्षि रोग में ), शिर पर चोट लगने पर; शंखक ( शंखक नामक शिरो रोग में ), रोहिणी रोग डिप्थीरिया, गलरोग में, मेह ( प्रमेह रोग में ), मदात्यय ( मद्यपान करने पर शराब का नशा चढ़ा होने पर ) इन अवस्थाओं में धूम पान नहीं करना चाहिये । इन कुसमयों में जो मनुष्य अज्ञान से धूम्र पान करता है, उसके धूम पान से कुपित वातादि दोष और रोग बढ़ाते हैं । जो ऊपर गिनाये जिन २ रोगों में मनुष्य धूम पीता है, उसके वे वे रोग बढ़ जाते हैं और नीरोगी व्यक्ति के अकाल में पीने से कठिन रोग हो जाते हैं ॥ ३६-४३ ॥ धूम किस प्रकार पीना चाहिये— धूमयोग्यः पिबेद्दोषे शिरो-घ्राणाक्षि-संश्रये ॥ ४४ ॥ घ्राणेनाऽऽस्येन कण्ठस्थे, मुखेन घ्राणपो वमेत् । आस्येन धूमकवलान् पिबन् घ्राणेन नोद्वमेत् ॥ ४५ ॥ प्रतिलोमं गतो ह्याशु धूमो हिंस्याद्धि चक्षुषी ।