भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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७६ चरकसंहिता [ अ० ५ मुखं प्रसन्नोपचितं स्वरः स्निग्धः स्थिरो महान् ॥ ५६ ॥ सर्वेन्द्रियाणां वैमल्यं बलं भवति चाधिकम् । न चास्य रोगाः सहसा प्रभवन्त्यूर्ध्वजत्रुजाः ॥ ६० ॥ जीर्यतश्चोत्तमाङ्गे च जरा न लभते बलम् । आंख अथवा ग्रीवा से ऊपर के अंग कान, नाक, आंख, शिर के क्षालण र्थात् धोने के लिये और अणु स्रोतस् इनके लिए हितकारी अणु तैल को पुरुष वर्षा ऋतु (श्रावण भाद्रपद), अथवा वर्षा का पूर्व भाग (आषाढ़ श्रावण), शरद् (आश्विन और कार्तिक), वसन्त (माघ फाल्गुन), इन तीनों कालों में जब आकाश बादलों से रहित एक दम निर्मल हो उस समय नस्य कर्म करे । जो पुरुष नस्य कर्मको ठीक प्रकारसे उचित समय पर करता है उसके न तो आंख, न कान और न नासिका पीड़ित होती हैं । उसके शिर के बाल न तो श्वेत होते हैं न भूरे (धूसर रंग के) होते हैं और न दाढ़ी मूंछ ही श्वेत होती हैं। बाल भा गिरते-झड़ते नहीं; अपितु विशेष रूपसे बढ़ते हैं । नस्य लेने से (मन्यास्तम्भ) ग्रीवा का अकड़ना, (शिरःशूलम्) शिरोवेदना (अर्दित) मुख का लकवा, (हनुसंग्रह) जबड़ों का जकड़ जाना, (पीनस) नासा रोग, (अर्द्धावभेदक) आधा सीसी और (शिरःकम्प) शिर का हिलना ये रोग शान्त हो जाते हैं । धमनियां, रक्तवाहिनी नाड़ियां और शिर की अस्थियां, शिर की सन्धियां (स्नायु) सूक्ष्म शिरायें, अथवा बन्धन-कण्डरा दृढ़ बन्धन रज्जु रूप शिर के बन्धन, नस्य प्रयोग से अधिक बलवान् हो जाते हैं । मुख प्रसन्न और तेजस्वी हो जाता है, स्वर (आवाज़) स्निग्ध, स्थिर, महान्, गम्भीर मीठा हो जाती है और सब इंद्रियां (आंख, कान, नाक आदि) निर्मल स्वच्छ एवं अधिक बल- वान् बन जाती हैं । नस्य कर्म करने वाले मनुष्य को गले से ऊपर के रोग अचा- नक उत्पन्न नहीं होते । क्षीण होते हुए उत्तमांग में नाक, आंख, शिर, गले के ऊपर के अंगों में बुढ़ापे की झुर्रियां आदि नहीं होते ॥ ५४-६० ॥ अणु तैल की विधि— चन्दनागुरुणी पत्रं दार्वीत्वङ्-मधुकं बलाम् ॥ ६१ ॥ प्रपौण्डरीकं सूक्ष्मैलां विडङ्गं बिल्वमुत्पलम् । ह्रीवेरमभयं वन्यं त्वङ्मुस्तं सारिवां स्थिराम् ॥ ६२ ॥ सुराहं पृश्निपर्णीं च जीवन्तीं च शतावरीम् । हरेणुं बृहतीं व्याघ्रीं सुरभीं पद्मकेशरम् ॥ ६३ ॥ विपाचयेच्छतगुणे माहेन्द्रे विमलेऽम्भसि ।