भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०७ औषधियों को सदा पास में रखे। इस प्रकार जीवनीय गण में कही हुई सम्पूर्ण औषधियो का नाना प्रकारों से सदा उपयोग करते रहना चाहिये। यह गर्भ स्थापन विधिया कह दी हे ॥ १८ ॥ गर्भोपघातकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा—उत्कटुक-विषम- कठिनासन-सेविन्या वात-मूत्र-पुरीष-वेगानुपरुन्धत्या दारुणानुचित-व्या- याम-सेविन्यास्तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेविन्याश्च गर्भो म्रियतेऽन्त कुक्षेरे- काले वा स्रसते शुष्यी वा भवति, यथाऽभिघातप्रपीडनै. श्वभ्र-कूप-प्रपा- तोदेशावलोकनैर्वाऽभीक्ष्ण मातुः प्रपतत्यकाले, तथाऽतिमात्रसंक्षोभि- भिर्यानैरप्रियातिमात्रश्रवणैर्वा । प्रततोत्तानशायिन्याः पुनर्गर्भस्य नाभ्या- श्रया नाडी कण्ठमनुवेष्टयति विवृतशायिनी नक्तचारिणी चोन्मत्तं जनयति, अपस्मारिण पुनः कलिकलहशीला । व्यवायशीला दुर्वपुष- मह्रीकं स्त्रैणं वा । शोकनित्या भीतमपचितमल्पायुष वा। अभिध्यात्री परोपतापिनमीर्ष्युं स्त्रैणं वा । स्तेनात्यायासबहुमलमतिद्रोहिणमकर्मशील वा। अमर्षिणी चण्डमौपधिकमसूतकं वा। स्वप्ननित्या तन्द्रालुमबुध- मल्पाग्नि वा। मद्यनित्या पिपासालुमल्पस्मृतिमत्तवस्थितचित्त वा। गोधा-मास-प्रिया शार्कंरिणमश्मरिण शनैर्मेहिन वा । वराहमांसप्रिया रक्ताक्षं क्रथनमतिपरुषरोमाण वा। मत्स्यमासनित्या चिरनिमेष स्तब्धाक्षं वा । मधुरनित्या प्रमेहिनं मूकमतिस्थूल वा । अम्लनित्या रक्तपित्तिनं त्वगक्षिरोगिणं वा। लवणनित्या शीघ्रवलीपलितं खालित्य- रोगिण वा । कटुकनित्या दुर्बलमल्पशुक्रमनपत्य वा । तिक्तनित्या शो- षिणमबलमपचितं वा । कषायनित्या श्यावमानाहिनमुदावर्तिनं वा, यद्यच्च यस्य यस्य व्याधेर्निदानमुक्तं तत्तदासेवमानाऽन्तर्वत्नी तद्विकार- बहुलमपत्यं जनयति । पितृजास्तु शुक्रदोषा मातृजैरुपचारैर्व्याख्याताः । इति गर्भोपघातकरा भावा भवन्त्युक्ताः ॥ १६ ॥ निम्नलिखित बाते गर्भ का नाश करनेवाली हैं। यथा—उकडू ( घुटनों के बल) अथवा विषम, टेढे मेड़े, ऊचे नीचे या कठिन आसन या स्थिति में बैठने, वात, मूत्र और मल के वेग को रोकने, दारुण या अनुचित व्यायाम का करने, अति तीक्ष्ण या अति उष्ण पदार्थों का सेवन, और भूख से कम (प्रमित) भोजन करने से गर्भ गर्भाशय में मर जाता है, अथवा विना समय के बह जाता है, या अन्दर ही सूख जाता है। इसी प्रकार चोट लगने से, दबने से, माता के गहरे गड़्ढे में, कुए में, जल-प्रपात के स्थान को बार बार देखने से अकाल